किसी दिन
खाद की तरह मिट्टी में गुम होता हुआ
दिख जाऊँगा खेत में
किसी दिन
डहर चलते हुए
पानी की तरह छलक पड़ूँगा
किसी दिन
थोड़ी-सी चिंगारी लिये
बच्चों की छुरछुरिया में रहने चला जाऊँगा
किसी दिन
तड़के सुबह ही
निकल जाऊँगा आकाशगंगाओं की तरफ
सैर के लिये
किसी दिन
गुब्बारों में भरा मिलूँगा
और बिकता रहूँगा हर साल मेले में
किसी दिन
किसी के जूड़े में फँसकर
महका करूँगा रात भर
किसी दिन
पहिये-सा लुढ़कता हुआ
पार कर जाऊँगा अपने नाम की सरहद
किसी दिन
अपनी किसी कविता में मुस्कुराता मिलूँगा
बिल्कुल ताजे
टटके
फूल की तरह।
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