मूक बधिर किसी शून्य में
धरती की सबसे गहरी सुरंग में कहीं
सर के बल उलटा लटके हुए बेबस
जेसे सारा उजियारा नष्ट हो जाए
सांस हो आस नहीं
आस को ना ही प्यास
एक मित्र ने गहरी आह ले कहा
सबकुछ कमाया परिवार नहीं कमा पाया
एक दोस्त तीसरे पैग पर,
जब हम बहुत हंस रहे थे किसी चुटकुले पर
वो बुझ गया,
अचानक मुर्दा बोल पड़ा हो जेसे
यार महीनों महीनों बात नहीं होती पत्नी से
जेसे सन्नाटा पसर गया
कोई नहीं सुन रहा कोई नहीं बोल रहा
सब दोस्त शून्य में,
एक आकाशवाणी हुई
दो ठंडे जिस्म रोज़ साथ सोते हैं
सर उठाकर बाहर देखता हूं
बदतमीज़ हो लोगों की खिड़कियों में झांकता हूं
कोई शीतयुद्ध है
जोड़े ख़ाना पूर्ती कर रहे
दो प्रेमी विलग हो रहे
क्रूर हिंसात्मक है संवाद हीन साथ
एक बिस्तर पर मृत शरीर
दो मृत आत्माओं की अपनी अपनी दुनिया
अपनी अपनी खुशियाँ
अपनी अपनी मुस्कुराहट,
सिर्फ अपनी!!?
दो ध्वनियाँ नहीं, एक आलिंगन नहीं?
बीच में जेसे कोई अदृश्य दीवार
दीवार को मोन सहमति
तो क्या प्रेम खत्म हो जाएगा
प्रकृति का सबसे बड़ा सत्य प्रेम छला जा रहा
प्रकृति छली जा रही
क्या बदलती दुनिया कोई जेल है
प्रेमी युगल जेसे कैदी
शून्य घिर रहा
मुझे किसी बच्चे सा खिल खिलाना है
सलाखें गलानी है,
फूल रंग उत्स कोई झूठी ही कहानी
अकारण रूठना मनाना
मुझे प्रेम गीत गाने हैं
तमाम घरों की अदृश्य दीवारें तोड़नी है
मुझे मेरे खो रहे दोस्त चाहिए
जल्दी जल्दी पैग उठा घर जाने को व्याकुल
फोन पर टाइम देखते
रिंग पर घबराते,
बिना दोस्तों की परवाह किए घर भाग जाते
प्रेम युं ही तो जिन्दा रहेगा
थोड़ा सा अल्हड़ हो
छेड़ना, छिड़ जाना प्रतिकार में
समंदर सी परवाह लिए
कसकर गले लगाना चुपके से
जाएं जाएं घर जाएं
दिनभर के किस्से सुने, सुनाएं
पत्नी को गले लगाएं, किस करें
प्रेम में जिएं
प्रेम में ही मर जाएं
क्या प्रेम खत्म हो रहा है
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