स्मृतियां चमगादड़ों सी मंडराती हैं
प्रेम का प्रेत रास्ता घेरे खड़ा है
पीछे की आहट सुनता हूं
तो आगे की राह अंधियारी हो जाती है
आगे बढ़ूं तो पीछा करता है कोई
अलक्षित- अनचीन्हा -अस्पष्ट -असंपृक्त -अदृष्ट
चेतना पर मैली सी चादर बिछ गई है
कुछ धुंधले से चित्र हैं जिनको
गौर से देखूं तो आँखें डूब जाती है
डूबकर सोचूं तो सांसे उथली हो जाती हैं
जीने की कशमकश के साथ शुरू होता है दिन
चिंताएं चढ़ते- चढ़ते सर पर तपने लगती हैं
मस्तिष्क में बैठा सर्प विष भरता जाता है समूचे गात में
और एक आदमी खो देता है आदमी होने का अर्थ
क्या इतना कठिन है आदमी बने रहना
कि एक भय
एक संशय
एक विस्मय
उसे मनुष्यतर बना दे
और प्रेम बाँहें पसारे खड़ा रह जाये सामने ही
संबंधित विषय – बिडम्बना
