कौन कहता है कि मैं आदमी हूं
मैं ताउम्र ताकता रहा कि कोई तो कहे मुझे आदमी
पर कहाँ पूरी हुई मेरी हसरत
यूं ही चला जाऊंगा
मेरे कान नहीं सुन पायेंगे कि मैं आदमी हूं
कोई बुरा आदमी भी कह देता तो बड़ा संतोष होता
पर किसी ने आदमी कहकर मुझे नहीं पुकारा
तनिक भी बुरा नहीं लगता यदि कोई कह देता कि कोई आदमी है
जो भी मेरे पास आया
एक अजीब सा रिश्ता जोड़ लिया
जब कोई कहता है ये रिश्ते ऊपरवाले ने बनाया है
तब ऊपर वाले से मेरा यकीन उठ जाता है
ये रिश्ते बीच जीवन में ही दम तोड़ देते हैं
क्या करूं इनका आकांक्षी बनकर
जो डुबो गया मुझे कीचड़ में
और मैं इससे निकलने के लिए छटपटाता रहा जीवन भर
कोई नहीं आया जो मुझे इस कीचड़ से निकाले
सब राहगीर की तरह चलते बने
ऐसा नहीं कि मुझे इन पर विश्वास नहीं था
मैं यही तो चाह रहा था
कि कोई मुझे आदमी समझे
जैसे मैं उसे समझता हूं आदमी
पर उसने अपना इतना ही फर्ज समझा कि मुझे ढेला समझ कर हाथ में उठा लिया
और शरारती बच्चे की तरह फेंक दिया बहुत दूर
चोट इतनी भयानक थी कि मैं कराह नहीं सकता था
निकल रहे थे केवल आंसू
इनकी धार में धीरे-धीरे गल रहा था ढेला।
मैं आदमी हूं?
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