मंजिल

किसी को ज्ञात नहीं है
फिर भी एक तयशुदा राह पर चलने के लिए
हम आतुर हैं

सब पथिक हैं
रास्ते अनेक हैं
एक रास्ते से क‌ई- क‌ई रास्ते निकलते हैं
क‌ई बार हमें दिशा- भ्रम भी होता है
चूक प्रस्थान बिन्दु की भी हो सकती है

हमें ज्ञात ही नहीं होता कि
सारे रास्ते मंजिल तक नहीं पहुंचते हैं
हम सिर्फ यात्री हैं
हम दूध की खोज में कभी – कभी
पहुंच जाते हैं सुरा की दूकान पर
यहां से लौटने का विकल्प तो है
लेकिन जो समय और श्रम गया
उसकी कीमत हमीं तो चुकाते हैं

और अंततः होता है क्या
सिक्ता कणों में जल खोजता हुआ पथिक
एक दिन दम तोड़ देता है
काश,सारे रास्ते मंजिल की ओर हो जाते मुखातिब !


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