नानी

आधी रात हो आई
नींद नहीं आ रही 
विद्रोही जी याद आ रहे 
विद्रोही जी के साथ याद आ रही हमारी नानी 
हमारी हम दोनों की साझा नानी,
हमारी माएं अलग अलग हैं
अलग अलग समय अलग अलग क्षेत्रों संस्कृतियों से 
नानी साझा है
हमारी नानी की याद साझा है
नानी, नानी की देह 
नानी का समूल अस्तित्व, नानी का रुआब 
समूचे विश्व को अलंकार सा धारे हमारी साझा नानी 
समूचे विश्व के केन्द्र बिन्दु सी हमारी नानी
हमारी नानी जेसे हमारा साझा सूर्य 
राजू/ रमाशंकर नानी के गुरुत्व में गोल गोल चक्कर काटते धोतरू 
नानी गोबर पाथती है 
गांव की सबसे बड़ी दीवार नानी ने कब्जा कर रखी
वहीं नानी गोबर के उपलों पर जीवन यात्रा लिख रही
दीवार उपलों से पाट दी 
कहीं कोई जगह ही नहीं जहां नानी ने जगह छोड़ी हो 
हर कोना नोक मात्रा की जगह भी गोल गोल उपलों से पथी हुई 
ये नानी की लगन है वर्चस्व या अक्खड़पन
नानी ने पूरी दुनिया गोबर सा मथ गोल बना रखी है
पूरा ब्रह्माण्ड विवश है नानी के आगे गोल घूमने को  
पर विद्रोही, शैतान हैं वो नानी को छेड़ता है
उसके पास सवालों कि जेसे पोटली धरी है
या बीड़ी की तलब लगी हो, बेचैन रहता है ” अधीर ” 
हम दोनों नानी के पास खड़े 
विद्रोही शोर करते हुए मैं चुप 
विद्रोही नानी देह नानी हृदय में कुछ तलाशते हुए 
मेरी नज़र नानी के हाथों पर
मुझे नानी की गोबर पाथते हाथ पसंद हैं
पसंद है उनकी टेढ़ी मेढ़ी उंगलियां 
तब सोचता था उंगलियां टेढ़ी केसे हो जाती होंगी, भला ?
एक उम्र के बाद त्वचा खुरदरी !!
अब समझ आ रहा श्वास दर श्वास जलती थी हमारी नानी
कभी आराम ही नहीं किया नानी ने
नानी अपनी धुरी पर निरंतर गोल‌ गोल‌ सत्य रही
हम दोनों,
मैं राजू , विद्रोही जी नंगी आंखों से देख पा रहे थे ” सूर्य “…


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