रेत हमेशा जिंदगी को परिभाषित करती रही है
ऐसे में प्रतिप्रश्न सम्मुख खड़ा होता है
रेत इतना ही सूखा है क्या..
रेगिस्तान सचमुच निर्जीव है क्या…
यदि हाँ
तो जिंदगी को याद करते ही रेगिस्तान भी
क्यों खड़ा हो जाता है पुतलियों में आकर..?
इसलिए तो नही
कि–
‘रेत जल का धुआं है!’
जहां जल है..आग है
वहीं तो जीवन है।
रेत हमे जल..नदी..समन्दर का पता देती है
बताती है
कि
यहीं कहीं पास ही तो है जिंदगी..!

Excellent.