रोज-रोज 2 Comments / By / वसुंधरा पाण्डेय मृत देह में तुमनेसंजीवनी रोपासींच-सींच जाते होजैसे कोईवृक्ष रोपता हैरोज-रोज पानी से सींचता है संबंधित विषय – प्रेम अगली रचना – समय» «पिछली रचना – अनकहा
बहुत-बहुत sunder
बहुत-बहुत sunder kavita