धीरे–धीरे साँस लेती माँ
तेज़–तेज़ साँस लेती बेटी
एक नींद में गुंथे
रात एक मैदान थी
बिछे थे जिसपर बारूदी सुरंग
तुम सोती थी बीचोंबीच
अपनी माँ से चिपटी
और फैलती जाती थी तुम्हारी नींद
दीवारों को निगलती हुई
मैं जागता रहता था
साँस रोके
बिस्तर के हाशिये पर
जो थोड़ी–सी जगह बची थी
वही मेरा कागज़ था
मैं चाहता था लिखना
धूप वाली कविता
लेकिन यहाँ गूंजती रहती थी
तुम्हारे रोने के बाद की शान्ति
खतरनाक था
कलम का खुरचना
मच्छर मारने की ताली
हर रात सोचता— कल लिख लूंगा
परसों लिख लूंगा
हर रात वही युद्ध
थक–हारकर
मैं तुमसे थोड़ी नींद चुराता
थोड़ी–सी जगह के बदले
मेरी सारी कविताएँ
यह सौदा
मैं रोज़ करता था
तुम सोती रहती
विजयी बेख़बर
और मैं लहराता चादर
सफ़ेद झंडे की तरह।
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