सन्नाटा

माथे पर बज रहा है अखंड सन्नाटा 
उम्मीद की चिड़िया फुदकना भूल गई है 
इरादों पर जम गई है बर्फ की मोटी सी चादर 
धुंध का राक्षस दृष्टि को निगलता जाता है 
स्वप्नों में उग आए हैं कंटीले जंगल 
पीठ पर सवार बेताल हर बार बोलते ही गर्दन मरोड़ देता है 
और हम मर जाते हैं 
फिर जी उठते हैं 
बार बार मरते हैं 
बार बार जी उठते हैं 
समझ नही आता कि मर मर कर जी रहे हैं 
या जीते जीते मर गए हैं


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