शत्रु

मैं चाहता हूं
वह दिन दूनी-रात चौगुनी तरक्की करें
इतनी कि पूर्णमासी की रात को
जब चाहें अमावस में बदल दें
हमारा जीना हराम कर दें
हम सांस लें
वह‌ हमारी सांसों में भर जाएं
हम सोए
गाल लाल-लाल पलाश के फूलों की तरह खिल जाए
बीमारियों का संसार बने
फले-फूले।


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