सुख-दुख

 इस बार देर नहीं लगी
 मैंने सुख को याद किया
 वह तत्काल आ गया।

 इतना अपना तो किसी का
 कभी नहीं रहता सुख।

अब दुख जाने कहाँ चला गया होगा !

पर मैं जानता हूँ 
वह लौटेगा
दुख कहीं भी मेहमान बनकर नहीं जाता
 हर घर को वह अपना घर समझता है।


स्रोत –  ‘उदासी का ध्रुपद’ संग्रह से साभार अवनीश यादव द्वारा बहता नीर के लिए चयनित।

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