चबूतरे पर उदास बैठी ये मैं हूं
यहां से दूर जाते तुम्हारे कदमों के
निशान खोजने मै नहीं जाती
मैं नहीं करती तुम्हारी कदमबोशी
लेकिन अपनी उदासियों का लेखा जोखा करते रहे तुम
तुम्हें अपने ख्वाबो में उतारते हुए
सारी सच्ची रातें दिन हो गयी हैं
और मुंह ताक रही हैं अपने प्रेमियों के
ज़माने की सारी थकन ओढ़कर
बिस्तरों पर गहरी नींद लेती प्रेमिकायें
धरती के सारे मुरझा चुके गुलाबों को सरकाकर सो गई है
और अब नींद है कि
तुम्हारे खरगोश की खाल वाले बिस्तरों से
आजाद होकर सारी प्रेमिकाओं के गाल पर थपकियां देगी ।
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