तुम तब भी थे

तब भी स्मृतियों में थे तुम
जब तुम पर
नहीं थी किसी की भी निगाह…
पहचाने जाते थे
इतने ही गौर से
मासूमियत थी जब चेहरे पर…
गाये गए थे तुम
उस दिन भी, उसी स्वर में
मौन थीं जब स्वरतंत्रियाँ…
उस भीड़ में-
शुरू थी तुम्हारी जीवन यात्रा
पूरा कर चुके थे सफर
तब, अनजाने ही…

स्वप्न की बयार चली
भले धुँधलके में
वे दर्ज तभी हो गई थीं-
दस्तावेजों में,
जब संजोने के नहीं थे साधन
जब तुम्हारा, नहीं था जमाना
पग खुले थे तब भी तुम्हारे
तब भी स्मृतियों में थे तुम।


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