बंदिनी नहीं हूं मैं 

वर्षों की तुम्हारी बनाई हुई व्यवस्था में
मैंने सेंध लगाई है
हां, तुमसे विरुद्ध जाकर
पहली बार मैंने स्वयं के लिए ‌ निर्णय लिया 
तुम्हारी बनाई हुई व्यवस्था से मुक्त होने का और
लांघ आई हूं देहरी

मैं जानती हूं
तुम्हें यह स्वीकार नहीं कि
कोई तुम्हारे विरुद्ध जाकर मुक्ति का मार्ग ढूंढ़े 

घर के दरवाज़े 
तुम्हारे तय किए गए समय के हिसाब से ही
खुलता रहा अब तक
सीमित समय के लिए
सीमित लोगों के लिए

ऐसे में
एक स्त्री कैसे तुम्हारे विरुद्ध हो गई?
तुम्हारी पोषित की हुई दासी ही तो थी
तुम्हारी नज़रों में
जिसको यह तक अधिकार नहीं था
कि वह अपनी मर्ज़ी से सांस भी ले सकें 
किसी से नज़रें मिलाकर बातें करें
वह तुम्हारे विरुद्ध?

तो सुनो, सुंदर और सुखद भविष्य का स्वप्न लिए 
वर्षों से रिश्तों को सहेजती रही 
देती रही अपना बलिदान
किन्तु मेरी सहनशीलता को
तुमने मेरी कमजोरी समझ
मेरे अस्तित्व को छला
तुम शायद यह भूल गए कि
मेरी ही रचना हो तुम 
फिर कैसे तुम्हारे द्वारा पोषित हुई मैं?
देखो ! खोल आई हूं मैं बंद- द्वार
माप आई हूं 
अपने हिस्से का आकाश।
बंदिनी नहीं हूं मैं।


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