विदाई

मुझे याद है
वह दिन
जब रात की रंगीनियत
बदल गई थी सुबह के मातम में

कुछ लोग आऐ थे
मेरे घर
किसी दूर देस से
मेरी दीदी को लेने

पहली बार
जब खोलीं थीं मैंने आंखें
मेरे नन्हें हाथों में थी
दीदी का अंगुली
हमेशा पाया उन्हें अपने पास

फिर यह कौन लोग थे?
किस देस से आए थे?
क्यूं आए थे?
मेरी दीदी को लेने

सबको रोता देख
मैं रोने लगा
मुझे लगा कि—
कोई मर गया है
तभी आवाज आई—
विदाई हो रही है
विदाई!
किसकी विदाई?
तुम्हारी दीदी की

सब रो रहे थे
कर-करके कारन
कि अरे मोरी बहनि तोहरे बिन जीयब कैसे
सबके अपने-अपने कारन थे
अपनी-अपनी पुकार
अपनी-अपनी ध्वनियां
अपनी-अपनी छवियां

उनका करूण विलाप छेद रहा था
मेरे नाजुक कोमल मन को
मेरे पास नहीं था कोई कारन
मैं झूल गया दीदी के कंधों पर
लगा चिल्लाने कि—
मेरी दीदी को कहां ले रहा हे‌ हो?

मां-मां तुम क्यूं नहीं रोकती दीदी को
वह कहां जा रही हैं?

किसी ने कहा—अपने घर

अपने घर!
तो यह घर उसका नहीं था
फिर कहां था उसका घर?

विदाई के बाद
सूने गंतव्य पथ पर
पसरे निचंट सन्नाटे को
तोड़ रही थी
मेरी चीखती-चिल्लाती आवाज

दीदी-दीदी-दीदी
तुम कहां चली गई?


5 2 votes
रेटिंग
guest
0 प्रतिक्रियाएँ
Inline Feedbacks
View all comments
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x