धूप
तुम दौड़ रही थी
अपनी परछाईं पकड़ने
फिर एक पैर पर खड़ी होकर
लांघने लगी उसे
मैं हँसा—
रोशनी सूरज से इतनी दूर आई है
सिर्फ़ तुम्हारी परछाईं बनाने
फिर तुमने मेरी परछाईं उठाई
और बांध लिया उसे अपने बालों में
रिबन की तरह।
***
पुकार
पापा मैं पानी पियूँ?
पापा ये अच्छा है?
पापा मैं खेलने जाऊँ?
बाहर इतनी बड़ी दुनिया थी
और तुम इतनी छोटी
मेरे जवाब का कोई मतलब नहीं था
तुम्हें बस सुननी थी मेरी आवाज़—
हाँ हाँ हाँ।
***
स्वीकार
तुमने कहा—
बिस्तर के नीचे भूत है
मैंने झुककर झाँका
वह थी वहाँ
सूटकेस के पीछे सिकुड़ी हुई
पानी में घुलते कागज़ जैसी
आँख मिलाने से बचती
उसकी शक्ल हम दोनों जैसी थी
शायद वही था
जिसे मैंने देखा था—
इम्तिहान की पिछली रात
मैंने हाथ बढ़ाया
तो मुझसे लिपट गई
हम देर तक वहाँ सोए रहे।
***
सत्य
सब छोटी बच्ची हैं
कोई बड़ा नहीं
हाँ, मैंने कहा
सब छोटी बच्ची हैं
अगले दिन तुमने टीवी पर देखा
एक आदमी चिल्ला रहा था
मैं चाहता था बंद कर दूँ टीवी
लेकिन खड़ा रहा
तुम सीख रही थी
कोई बड़ा नहीं है।
***
वापसी
तुमने कागज़ की नाव बनाई
मुझसे कहा— इसमें बैठो
फिर बाघ की आहट सुनाई दी
हम भागे
चिड़ियों का झुण्ड
डूबते सूरज को जयमाल पहना रहा था
दूर बिजली चमक रही थी
गुड़गुड़ गुड़गुड़—
भूख लगी है पापा
और हम वापस काटने लगे
टमाटर।
0 प्रतिक्रियाएँ
