खूंटा की लुगाई भी बह गई

khoota ki lugai

बरौनी बऊ (अम्मा) अक्सर एक कहानी सुनाती थी। कहती कि नदी हर बाढ खेतों को आबाद करती है। हर बाढ़ में किसी को कुछ-न-कुछ देती है। नदी अपने पल्लू में चाँदी के कई हल छिपाए बहती है। चौदह साल में एक बार नदी किसी गरीब पर मेहरबान होती ही होती है, बाढ़ आने पर जिसे देती है चाँदी का हल।

लेकिन, बरौनी बऊ की बातें सिर्फ़ कहानी में थीं। हर साल बरसात के दिनों में सिंदूरी पूरे उफ़ान से बहने के बावजूद चाँदी का हल लाते हुए नहीं दिखती थी। तब वह अपनी सामान्य चौड़ाई से तीन-चार गुना तक चौड़ी होकर गरजती हुई बहा करती थी। हालाँकि, इस विकट रूप में बह कर भी सिंदूरी किसी तरह का नुकसान नहीं पहुँचा पाती थी क्योंकि गाँव नदी और उसके घाट से काफी ऊँचाई पर बसा हुआ था, फिर भी ग्रामीण सिंदूरी के तीव्र प्रवाह को बाढ़ या पूर कह दिया करते थे।

सिंदूरी में जब पहला और दूसरा पूर आता था तो पूरा गाँव नज़ारा देखने के लिए सिंदूरी के घाट पर जमा हो जाता था। वजह यह होती थी कि पहले और दूसरे पूर में घाट के आस-पास के वृक्ष, मकान में काम आने वाली लकड़ी की मियार (वृक्ष से टूट कर अलग हुआ तना), जलाऊ लकड़ियाँ और कभी-कभार तो खेत में रखे हल और बर्तन तक बह कर आ जाते थे। ऐसे समय में गोताखोर खासे सक्रिय हो जाते थे और इन सबको पकड़ने के लिए आपस में उनकी प्रतिस्पर्धा हो जाया करती थी। यही प्रतिस्पर्धा बाकी ग्रामीणों के लिए खेल हो जाता था और गोताखोरों के करतबों को देखने के लिए गड़ईपुरा घाट मनोरंजन-स्थल में बदल जाता था।

एक साल बरसात के दिनों की ही बात है, जब मैं ग्यारहवीं में था तो पूर देखने गड़ईपुरा घाट की ओर चल दिया। मेरे साथ हमारे घर काम करने वाला जेताराम भी था और हम दोनों अपने-अपने काले छातों से सिर ढंक कर मूसलाधार बारिश में ही सुबह-सुबह पूर देखने चल दिए। सेठानी काकी की दुकान से बाएँ मुड़कर खब्बर खब्बर कीचड में बरसाती जूतों के सहारे किसी तरह सिंदूरी घर के करीब तक पहुंचे तो देखा कि पानी बरगद की शाखाओं तक छू कर बह है और उसके नीचे बिराजे शंकर जी जलमग्न हो गए। यानी जिस बरगद के नीचे गर्मियों में बच्चे दिन-दिन भर खेला करते थे. वह जगह नदी बन गई पर पूरे उफान पर दहाड़ रहा था और बडे-बडे वृक्ष उखाड़ कर ला रहा था। इन्हें अकेले या अलग-अलग समूहों में पकड़ने के लिए गोताखोर पानी हालाँगें मार रहे थे। वे गोंडपुरा के घाट से कोई चीज़ आते देख घाट पर ही बड़े-खड़े दूर से ही पहचान लेते थे कि क्या बह कर आ रहा है! इधर, गड़रियापुरा एट पर नजदीक आते ही गोताखोर पूर के बहाव के बीच छलाँग मार कर उसे पकड़ लेते और कुशलतापूर्वक तैरते हुए दूर किनारे लग जाते।

पूरे गाँव के साथ मैं भी उस साल अपने छाते की ओट से गोताखोरों की उपलब्धियों का आनंद ले रहा था, जो गोताखोर किसी सामान को जान की बाज़ी लगा कर पकड़ रहा था, वह चीज़ उसकी होती जा रही थी। लोग गोताखोरों के नाम पर तालियाँ बजा रहे थे और अधनंगे गोताखोर अपनी बहादुरी पर चौड़े हो रहे थे। तेज बहता पानी और बहुत गहरा पानी मुझमें कहीं गहरे डर पैदा करता है। हालाँकि, न हमने कभी देखा था और न ही बुजुर्गों से सुना था कि सिंदूरी ने कभी किसी की जान ली हो। पर, थोड़ी देर बाद जो हुआ वह मजे मजे में मौत का मंज़र बन आँखों के सामने ही झूल गया। जो कुछ भी हुआ, पलक झपकते ही हुआ था-

मदनपुर में एक नया गोताखोर तैयार हो रहा था, नाम था – खूंटा। पच्चीसेक साल का खूंटा पूर आने पर नदी किनारे बहकर आने वाली जलाऊ लकड़ियों को पकड़ते हुए एक जगह जमा करता जाता था। इन लकड़ियों को खूंटा की लुगाई साल भर चूल्हा जलाने में तो इस्तेमाल करती ही थी, बहुत सारी जलाऊ लकड़ियों को बेच भी दिया करती थी। खूंटा खेतिहर मज़दूर और महज दो-ढाई एकड़ खेत का मालिक था। बरसात में जब उसके पास करने के लिए कोई कुछ काम नहीं होता था तो उसकी कोशिश होती थी कि पूर से ज्यादा-से-ज्यादा लकड़ियाँ जमा कर सके। उस साल पूर कहीं ज्यादा उफान पर था और मानो पूरा गाँव बहा ले जाने की चुनौती देता दहाड़ रहा हो। बड़े-बड़े गोताखोर भी कूदने से पहले आपस में एक-दूसरे को हिम्मत बँधा रहे थे तो उकसा भी रहे थे।’ये हो ये हो’ कह कह कर नदी में कूदने के लिए उत्साहित कर रहे थे। उस साल पूर में सामान भी ज़्यादा ही बह कर आ रहा था। बडे-बडे गोताखोर एक दूसरे को देख के उपक्रम में बडी बहादुरी से नदी में कूद कर वे सामान अपने कब्जे में भी करते जा रहे थे तो बहुत सारा सामान तेजी से बिना हाथ लगे बहे जा रहा था। घंटों से यही खेल चल रहा था।
इस बीच किसी ने खूंटा का मज़ा लेने के चक्कर में खूंटा से बोल दिय “खूंटा भैया तुमाए तो आज भाग खुल गए, बा देख नदिया तेरे लाने चाँदीको हल बहाए ला रही है, तुमाय हाथ लग गऔ तो घरोघर दिन-मजूरी के कामों के मुक्ति मिल जेहै!”
खूंटा भोला-भाला आदमी था। ज़्यादा नहीं समझता था। इस मजाक या उससे किसी ने कूदने की अपेक्षा भी नहीं की होगी। लेकिन, उसने चाँदी के हल का नाम सुनते ही बगैर ज्यादा सोचे-समझे अचानक पूर के घरघराते वेग में उछाल मार दी किसी पतली लकड़ी की तरह। चाँदी का हल तो लोगों ने बड़े-बूढ़ों की कहानियों में ही सुना था, सच्चाई भी यही थी कि उस पल चाँदी का हल पूर में नहीं था। हाँ, एक लकड़ी का हल था। लेकिन, खूंटा बड़ा तैराक तो था नहीं, जो उस साल ज़्यादा ही उफ़ान मार रहे पूर में तैर कर किनारे लग जाता। इसलिए पूर में कूदा खूंटा तेज़ी से कहीं और, जबकि लकड़ी का हल कहीं दूर एक ही दिशा में देखते-ही-देखते बहते हुए आँखों से ओझल हो गए! ये क्या हुआ! खूंटा बह गया !
“खूंटा बह गऔं, खूंटा बह गऔ!” का शोर मच गया। तेज़ धार में खूंय के बह जाने के बाद नदी किनारे तब जितने लोग थे, सबके सब वहाँ से भागे और डर के मारे अपने-अपने घरों में घुस गए। गाँव में जब किसी भी तरह का अपराध या हादसा होता तो छड़ीदार दादा का ज़िम्मा था कि वे तेंदूखेड़ा थाना जाकर पुलिस को सूचित करें। लेकिन, छड़ीदार दादा की मौत के बाद उन्हीं के परिवार का एक नन्ना नाम का उनका ही भतीजा उनकी जगह यह काम करने लगा था। पुलिस को खूंटा के बह जाने की खबर लग चुकी थी और सभी को पुलिस के आने और सख्ती से पूछताछ का डर लग रहा था। लोगों को लग रहा था कि पुलिस उन्हें मारेगी और झूठे आरोप लगा कर थाने ले जाएगी। इसीलिए भूले से भी कोई किसी को बता नहीं रहा था कि उस दिन क्या हुआ था, खूंटा बह कैसे गया! मैंने बहते समय खूंटा के मुँह से इतना भर सुना था, “जै नरबदा मैया, बचा ले!” जाहिर है कि सिंदूरी नदी के पूर में बहते हुए वह नर्मदा मैया से अपनी आन बचाने की गुहार लगा रहा था। हमारे परे अंचल में ही नर्मदा जी के प्रति सच्चा लगाव था। मन में श्रद्धा का भाव था। उस समय खूंटा को भी लगा होगा कि सिर्फ नर्मदा माँ ही उसे बचा सकती हैं।

खूंटा जब चौबीस घंटे बाद भी नहीं लौटा तो सब यह मान कर चलने लगे कि अब उसका लौटना मुश्किल होगा। किसी किनारे लगा होता तो एक दिन, एक रात बाद तक तो आ ही सकता था, पर जब बरसात थम गई, धूप खिल गाई, सिंदूरी का पूर भी उतर गया तो लगा कि खूंटा सच में लंबा बह कर नर्मदा में ही समा गया होगा!

पुलिस आनी थी, पर वह आई ही नहीं। हादसे के एक दिन बाद गाँव के बड़े-बूढ़ों के साथ कुछ लोग फिर नदी किनारे जमा हुए। नदी बाढ़ जाने के बाद शांत बह रही थी। सबने मिल कर तय किया कि यदि नदी के कुछ कोस तक खूंटा की लाश कहीं फँसी पड़ी मिले तो उसे निकाला जाए और उसका क्रिया-कर्म किया जाए। इसके लिए बड़े-बड़े गोताखोर फिर नदी में कूदे। उन्होंने सिंदूरी में दो से तीन बार खूंटा को ढूँढ़ने की कोशिश की, लेकिन हर बार खाली हाथ लौटे। बहुत जतन के बाद जब खूंटा की लाश न किनारे, न किसी पेड़ में फैंस कर झूलती हुई दिखी तो लोगों को अंदेशा होता कि खूंटा कहीं भूत तो नहीं बन जाएगा !

इधर, खूंटा की लुगाई पीपरपानी वाली का बहुत बुरा हाल हो गया था। वह छाती पीट-पीट दहाड़े मारे रोये जा रही थी। गाँव की सियानी-से-सियानी औरतों के लिए भी उसे सँभालना मुश्किल हो रहा था। खूंटा का कोई बच्चा भी नहीं हुआ था। खूंटा की लुगाई खूंटा के बगैर जीये भी तो किसकी आस लेकर। जितनी बार गोताखोर नदी में खूंटा को खोजने तैर कर जाते, उतनी बार खूंटा की लुगाई पीपरपानी वाली को यह आस रहती कि खूंटा लौट आएगा। मगर, हर बार जब पीपरपानी वाली के हाथ निराशा लगती तो उसके भीतर का सदमा गहराता जाता। मातम में वह स्थिति भी आई जब खूंटा की लुगाई पीपरपानी वाली की आँखों से आँसू भी सूख गए और कई दिनों तक उसने अनिश्चितकालीन मौन धारण किए रखा। कई दिनों तक वह बेसुध, भूखी-प्यासी ही रही। शायद पीपरपानी वाली को भी लगने लगा था कि खूंटा कभी न लौटेगा ! पीपरपानी वाली का नाम ही पीपरपानी वाली हो गया था तो इसलिए कि गाँव में आने वाली बहुओं के संबोधन उनके मायके के गाँवों से जुडे होते थे। जैसे, विवाह के बाद टेकापार से आई काकी का असली नाम किसी को नहीं पता था, पर वह हमेशा के लिए ‘टेकापारबारी काकी’ हो गई थी, या फिर बिछुआ से अपनी ससुराल मदनपुर आई महिला की छाप ही पड़ गई थी ‘बिछुआ बारी भौजी’।

बरसात के दिन खत्म हो गए और हल्की ठंड पडने लगी, लेकिन समय के एक अंतराल के बाद मुझे खूंटा हर जगह पहले से कहीं अधिक दिखाई पडने लगा। गोताखोरों को खूंटा या उसका शव सिंदूरी नदी में दूर-दूर तक लाख हुँदै से भी न मिला था। इसका मतलब वह अपने गाँव से कितनी दूर तक बह सकता है? इस तरह के प्रश्न तब सोचते हुए एक दिन मैंने किताब खोल कर नर्मदा का रेखाचित्र देखा। मैंने देखा कि कोई सवा आठ सौ मील लंबी नर्मदा में एक जगह पर बारीक नीली और घुमावदार लकीर लिए सिंदूरी मिल रही थी। जहाँ पर नर्मदा-सिंदूरी का संगम-स्थल था, वहाँ से भी नर्मदा खूंटा को दूर बहा ले गई होगी, लेकिन फिर प्रश्न कि मदनपुर गाँव से कितनी दूर? आखिर कितनी दूर तक नर्मदा खूंटा को अपने साथ बहा ले गई होगी ? उत्तर की खोज में नर्मदा के नीले रेखाचित्र पर मेरी उँगलियाँ दूसरे छोर तक चली गईं। मध्य प्रदेश की जीवन-रेखा के उस पार गुजरात के भरूच शहर तक। हरदा, ओंकारेश्वर, मंडलेश्वर से होते हुए भरूच और फिर वहाँ से अरब-सागर स्थित एक तिकोनी आकृति खंभात की खाड़ी में, जहाँ नर्मदा समंदर में विलीन होती है, वहीं तक क्या खूंटा पानी-पानी होते समुद्र के तल तक हमेशा के लिए विलीन हो गया ? इसका अर्थ तो यही था कि जीते जी जो गाँव से बाहर नहीं निकल पाया, वह सिंदूरी के पूर में बहकर बहुत दूर चला गया था। इतना दूर कि फिर गाँव उसके लौटने की कल्पना करना भी भूल गया था।

इधर, दिनोंदिन गाँववालों को यह चिंता सताए जा रही थी कि कहीं खूंटा भूत तो नहीं बन जाएगा! गाँव में पहले से ही कई पीढ़ियों पुराना एक भूत बताया जा रहा था, जो जब-तब किसी-किसी को रात-बिरात बस स्टैंड पर बैठा, तो कभी वहीं पीपल के पेड़ पर चढ़ता-उतरता और उलटा झूलता तो कभी-कभार तो किसी से रात में रोक कर बीड़ी माँगता दिखाई पड़ता था। हालाँकि, ऐसा कोई किस्सा खूंटा के बारे में सुनने को नहीं मिला था, पर यदि सिंदूरी नदी में भी खूंटा का भूत रहने लगा तो गाँववालों के सारे काम ही प्रभावित हो जाएँगे, यही सोच कर कुछ लोग समाधान हेतु सालकराम गुनिया के पास गए। सालकराम गुनिया ने थोड़ी देर अपनी तंत्र-मंत्र की विद्या का प्रदर्शन किया। फिर सभी को आश्वस्त किया कि खूंटा भूत नहीं बना है। सलकराम गुनिया की मानें तो जब तक खूंटा की लाश न मिले तब तक उसे जिंदा ही माना जाए। हाँ, लाश मिल गई तो वह अवश्य भूत बन जाएगा, क्योंकि खूंटा अकाल मौत मरा था। सालकराम गुनिया की बात सुन कर सबकी जान में जान आई, क्योंकि फिर सब पहले जैसा हो गया था, महीनों बाद फिर से वे अपने बच्चों को सिंदूरी नदी किनारे खेलने के लिए भेजने लगे थे। उन दिनों बिजली एक बार गई तो बड़ी मुश्किल से लौटती थी, इसलिए टीवी होने के बावजूद जब गाँव में बिजली नहीं होती थी तो गाँव के बच्चे सिंदूरी नदी किनारे ही ज़्यादा-से-ज्यादा खेला करते थे।

सालकराम गुनिया की बात जब पीपरपानी वाली के कानों तक पहुँची तो उसकी चेतना पर विपरीत असर पड़ा। उसका चेहरा खुशी से खिल गया। पूरी तरह निराशा के बाद जब आशा की एक किरण कोई दिखा दे तो ऐसा ही होता होगा ! वह भी सोचने लगी थी कि जब तक खूंटा की लाश न मिले तब तक उसे क्यों मरा हुआ माना जाए! क्यों विधवा की तरह जीवन जिया जाए! क्यों साज-श्रृंगार छोड़ दिया जाए ! पीपरपानी वाली के इस बर्ताव पर कुछ औरतें कुढ़ गईं कि कैसी लुगाई है जो खसम के नदी में बह जाने के बाद भी सजना-संवरना नहीं छोड़ती है! वहीं, कुछ औरतें थीं जो कि उसकी मनःस्थिति समझते हुए उसे दिलासा भी दे रही थीं कि खूंटा एक दिन लौट आएगा! पीपरपानी वाली भी पति के वियोग में दिन गुज़ार रही थी, इसी दिलासा में कि खूंटा आएगा वह कहीं किसी से माँग कर तो कहीं किसी के घर मजूरी करके किसी तरह बस जिंदा थी।

लेकिन, जब महीनों बीत जाने के बाद भी खूंटा नहीं लौटा तो पीपरपानी वाली अपने आपसे बातें करने लगी। वह पहले मन-ही-मन बातें करती हुई बुदबुदाती थी, मगर फिर धीरे-धीरे बड़बड़ाने लगी। कोई पूछे कि अकेले अकेले किससे बातें कर रही हो तो बताया करती कि वह उसके अपने पति खूंटा से बतिया रही है। वह घंटों सिंदूरी के तट पर अकेली बैठा करती थी। वह अपने जीवन के अकेलेपन को गहरा करती जा रही थी। नदी के तट पर अकली बैठी देख कोई उससे पूछ ही लेता कि घंटों तक अकेली क्यों बैठी हो तो पीपरपानी वाली कहती कि खूंटा बहा नदी के रास्ते ही है, यदि लौटा भी तो नदी के रास्ते ही लौटेगा। इसलिए, वह वहीं बैठ कर खूंटा के नदी के रास्ते से लौटने का इंतज़ार कर रही है। कोई उसे घर लौट जाने के लिए कहता तब भी वह बैठी ही रहती। महीनों बीत गए तब भी खूंटा का कोई अता-पता न था। पूरे गाँव को जिस बात पर यकीन नहीं था, उस पर एक अकेली पीपरपानी वाली को यकीन था और उसके बताने के लहजे से लगता था कि उसे अपनी बात पर पूरा यकीन है कि खूंटा नदी के रास्ते ही लौटेगा।

पीपरपानी वाली का अपने पति की विरह-वेदना में एक-एक दिन काटना भारी पड़ने लगा। उसकी अपने आपसे बडबडाने की आदत बढती ही चली जा रही थी। वह खुद से ही बातें करती। हँसती, रोती, लजाती तो कभी चुप बैठ जाया करती थी। फिर वह एक ऐसी बात कहने लगी जिस पर किसी को भरोसा नहीं हो सकता था। वह कहने लगी कि खूँटा देर रात घर आता है और सुबह होने से पहले फिर सिंदूरी नदी की ओर लौट जाता है। कुछ औरतों ने जब उससे यह पूछा कि अब तक वह कहाँ था तो बताती कि खूंटा एक वृक्ष की शाखा पर ही रहा। वह किसी से मिलना नहीं चाहता इसलिए कोई खोजे भी तो खूंटा उन्हें देख कर छिप जाता है। उसकी बात पर किसी को विश्वास न होता, पर पीपरपानी वाली कि मनःस्थिति ही ऐसी थी कि लोग उसके बारे में क्या सोच रहे हैं इससे उसे फ़र्क पड़ना लगभग बंद हो गया था। हाँ, जब कोई कहता कि खूंटा न लौटेगा तो वह बिफ़र पड़ती और भावावेश में कई बार तो गालियाँ तक बकने लगती। औरतें पीपरपानी वाली से जब पूछा करतीं कि कई-कई दिनों तक खूंटा वृक्ष की शाखा पर क्या करता रहा तो वह एक और अजीब बात बताती। पीपरपानी वाली का उत्तर होता कि सिंदूरी नदी और खूंटा के बीच कई दिनों से बहुत सारी बातें चल रही हैं और सिंदूरी नदी न जाने क्यों खूंटा को घर लौटने से रोका करती है। सिंदूरी अपनी बहुत सारी बातें खूंटा को सुनाना चाहती है कि थकती ही नहीं। इन बातों के बदले सिंदूरी नदी कह रही है कि वह खूंटा को चाँदी का हल दे देगी। फिर वह यह भी कहती कि सिंदूरी एक माई होकर भी खूंटा का ख़याल नहीं रखती। यदि रखती होती तो खूंटा सूख कर काँटा न हो गया होता। दूर नदी किनारे रहते हुए उसे सुख की दो रोटियाँ नहीं मिल रही हैं, जो वह बना दिया करती थी। आखिर अपना घर अपना ही होता है।

सामान्यतः कोई किसी अपने की मौत के बाद व्यक्ति अत्यंत गहरी निराशा और पीड़ा में डूब जाता है, लेकिन एक समय के बाद कोमल-से-कोमल मन भी खुद-ब-खुद तमाम तरह की वेदनाओं से उभर कर किनारे लग जाता है। लेकिन, पीपरपानी वाली के साथ ठीक उलट हो रहा था। वह धीरे-धीरे विरह-वेदना की चरम-सीमा पार कर चुकी थी और अपने आस-पास एक ऐसा घेरा तैयार कर चुकी थी जिसमें वह थी और उसका पति खूंटा था और इसके अलावा कोई नहीं था। तीसरे के तौर पर आदमी तो दूर जैसे उसके जीवन में अपने खेत, खलिहान और घर तक महत्त्वहीन हो गए थे। खूंटा के बह जाने के बाद उसका प्रेम जैसे सतह पर आकर पूर का रूप ले चुका था। समय बीतने के साथ ही खूंटा को वह इस हद तक चाहने लगी थी कि खूंटा के अस्तित्व और उसकी जीवंत उपस्थिति की अनुभूति करती। लगता कि उसी के साथ जीवन जी रही है। प्रिय के लौट आने की आस प्रिय की अनुपस्थिति को सामान्य नहीं होने देती।

एक स्थिति के बाद तो वह कहने लगी कि खूंटा देर रात जब खाने के लिए घर आता है तो वह खूंटा की पसंद का खाना बनाती है और दोनों एक ही थाली में साथ बैठ कर खाना खाया करते हैं। यह एक ऐसी स्थिति थी कि जब लोगों को उसके विश्वास पर विश्वास नहीं होता था और उसका विश्वास लोगों को अंधविश्वास लगता था। पर, पीपरपानी वाली को अपने विश्वास पर पूर्ण विश्वास था और लंबे समय से वह अपने विश्वास पर अडिग दिख रही थी। पर, कुछ दिनों बाद वह अपने विश्वास को पुख्ता दिखाने के लिए लोगों को भी विश्वास दिलाने का यत्न करने लगी। इसके लिए वह यहाँ से वहाँ घूमा करती और राह चलते जो मिलता उसे खूंटा से जुड़ी हुई तरह-तरह की कहानियाँ सुनाया करती। लोगों का मानना था कि खूंटा के बिना पीपरपानी वाली पगला गई है और वे उसके प्रति हमदर्दी जताते हुए उसका मन रखने के लिए कई बार तो उसकी हाँ में हाँ भी मिला देते थे। हालाँकि, कुछ ऐसे भी थे जो उलटा पीपरपानी वाली को सदमे और पागलपन से उबारने के लिए उससे तरह-तरह के प्रश्न करते रहते थे, जैसे कि यदि खूंटा है तो बाकी लोगों को क्यों नहीं दिखता, वह घर आता है तो बार-बार लौट क्यों जाता है, वगैरह। इन प्रश्नों को सुन पीपरपानी वाली कभी तो गुस्सा हो जाया करती, लेकिन कई बार बताती कि खूंटा ने ठान लिया है कि वह सिंदूरी नदी से चाँदी का हल लेकर ही एक दिन गाँव आएगा और तब पूरे गाँव को बताएगा कि चाँदी का हल आखिरकार उसी के हाथ लगा, बड़े-बड़े गोताखोर बस देखते रह गए और कैसे चाँदी का हल उसी का हुआ। वह सिंदूरी से चाँदी का हल लेकर एक दिन लौटेगा ! ऐसा हुआ तो उनके गरीबी के दिन भी दूर हो जाएँगे ! वह ये सारी बातें बताते हुए यह भी बताती कि उसे चाँदी का हल नहीं चाहिए, पर खूंटा की जिद के आगे वह खुद हार चुकी है। बाकी उसका एक सबसे बड़ा दावा यह भी था कि किसी भी दिन वह सबके सामने खूंटा को खड़ा कर सकती है। इस बीच होने यह लगा कि वह मन-ही-मन खूंटा से लड़ाई करती हुई दिखती। सिंदूरी नदी की ओर मुँह करके चिल्लाने लगती कि कब तक वह उससे मिलने देर रात अकेला चुपचाप आता रहेगा। कभी तो दिन में परे गाँव के सामने भी आए ! कब तक चाँदी के हल के लालच में घर और गाँव वालों से भागता रहेगा! कब तक लोगों से नहीं मिलेगा ! वह बड़बडाती, “सबके सामने मोहे झूठो ठहराके तोहे का मजा आ रओ है?” वह आकाश की ओर उँगली दिखाते हुए खूंटा को चेतावनी देने लग जाती कि यदि वह जल्द ही सबके सामने नहीं आया तो उसे खुद ही नदी के रास्ते उससे मिलने आना पड़ेगा। कभी नदी को धमकाते हुए कहती कि वह खुद किसी दिन नदी बन जाएगी।

पीपरपानी वाली की हालत दिन-ब-दिन अब बिगड़ती ही जा रही थी और उसे ठीक से सँभालने वाला भी तो कोई न था। सबको लगता कि उसकी खैर-खबर लेने उसके मायके से कोई तो आएगा ही, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पीपरपानी वाली की आँखें धँसती चली गई थीं। आँखें पनीली, मुँह रुआँसा और चेहरा पिचक गया था। बालों में धूल-मिट्टी लदने से उसके यौवन का आकर्षण खत्म हो गया था। वह अपनी उम्र से बड़ी लगने लगी थी। एक बार उसने अचानक ही एक बड़ा फ़ैसला लिया। उसने पूरे गाँव में घूम-घूम कर यह बात बताई कि खूंटा घर आ गया है और सबसे मिलना चाहता है। उसकी मानें तो इसके लिए खुद खूंटा को उसने तैयार कर लिया है और आखिरकार खूंटा मान भी गया है। फिर क्या था कि उसके दावे पर पूरा गाँव उसके घर को घेर कर खड़ा हो गया। पीपरपानी वाली घर में एक लकड़ी के खूंटे से बातें किए जा रही थी। उसे पीट-पीट कर शिकायतें करती जा रही थी। कुछ देर बाद झगड़ते हुए खूंटा से गाँववालों की करतूतें बताने लगी। फिर सारी लोक-लाज भूल वह लकड़ी के उस खूंटे से चिपक गई। कहने लगी कि चाँदी के हल के लालच से कब तक बाहर रहेगा। चाँदी का हल छोड़, उसके बगैर भी सुख से रह लेंगे ! चुपचाप घर लौट कर पहले की तरह खेती-मजूरी का काम शुरू कर ! फिर अचानक ही तेज़ गुस्से के बाद जब वह फूट-फूट कर कलपते हुए रोने लगी तो कई सारी औरतों ने उसे किसी तरह लकड़ी के उस खूंटे से अलग किया। उन औरतों ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की कि दरअसल उसका पति खूंटा लौटा ही नहीं है और जो बातें वह बता रही है, वह कुछ नहीं बस मन का भ्रम है। इधर, पीपरपानी वाली कहाँ मानने को राजी थी कि यह सब उसके मन का भ्रम मात्र है। औरतों की बातों को सुनकर पीपरपानी वाली और अधिक दुखी और निराश होकर धीरे-धीरे देर तक रोती रही। बहुत सारे लोग चले गए, तब भी रह-रह कर वह अपने पति खूँटा से शिकायत के लहजे में बडबडाती ही रही कि जैसे मानो खूंटा उसके पास ही बैठा सब कुछ चुपचाप सुन रहा हो। पीपरपानी वाली कहती कि जल्द ही वह भी घर छोड़ देगी। अकेली क्या करेगी? नदी के रास्ते यदि उसका पति ही सबके सामने नहीं आ रहा है तो एक दिन वह अकेली ही नदी के रास्ते उससे मिलने तैर कर जाएगी !

धीरे-धीरे गाँववाले भी उसके व्यवहार से तंग आ गए और उसे अकेला छोड़ उसकी तरफ़ ध्यान देना कम करने लगे। पीपरपानी वाली भी फटेहाल रास्तों पर बड़बड़ाती हुई घूमती। राह चलते जो दिखता उससे यही कहती कि वह अपने पति खूंटा से जल्द मिलने जाएगी। लौटी तो उसी के साथ लौटेगी, अन्यथा वहीं रहेगी और फिर गाँव नहीं लौटेगी! पीपरपानी वाली को लोग अक्सर पहले से ज्यादा समय तक सिंदूरी नदी के घाट पर अकेली बैठा देखा करते। वह वहाँ जम कर बैठ जाया करती और जबरन उठाने से भी उठने का नाम नहीं लेती थी।

इधर, परीक्षा नज़दीक आते देख मैं भी अपनी पढ़ाई में रम गया। लेकिन, एक दिन मैंने घर पर काम करने वाले जेताराम से पीपरपानी वाली के बारे में पूछा तो उसने अंदेशा जताते हुए बताया कि पीपरपानी वाली बस अब कुछ दिनों की मेहमान है और उसकी हालत देख लगता है कि वह जल्द ही मर जाएगी। मैंने पूछा तो क्या उसने खाना खाना लगभग बंद ही कर दिया है। जेताराम कहने लगा कि खाना तो वह कभी-कभार खा भी लेती है, इसलिए भूख से दम नहीं तोड़ेगी, बल्कि मरी तो नदी में डूब कर मरेगी! मुझे उसकी बातों पर विश्वास नहीं हुआ। लेकिन, जेताराम को अपने विश्वास पर पूर्ण विश्वास हो गया था। मैंने जानना चाहा कि उसे ऐसा क्यों लगता कि पीपरपानी वाली नदी में डूब कर मरेगी तो जेताराम ने बताया कि पीपरपानी वाली अपनी सुध खो चुकी है। कई बार ऐसा हुआ कि उसे किसी ने खाने के लिए भोजन दिया और उसने एक निवाला तक नहीं खाया। वह बस नदी में तैर कर खूंटा से मिलने की रट लगाए रहती है।

जेताराम खूंटा का बचपन का दोस्त था और उसका घर खूंटा के घर के सामने ही था। इसीलिए उसे पीपरपानी वाली से ज्यादा हमदर्दी थी और उसकी जानकारी के मुताबिक पीपरपानी वाली कई बार तो रात को भी नदी की ओर चल देती थी खूंटा से मिलने के लिए, उससे लड़ने के लिए। दरअसल, पीपरपानीवाली के मन में यह बात बैठने लगी थी कि खूंटा घर का रास्ता भूलने लगा है। इस बीच खूंटा को बहे हुए एक साल पूरा हो गया। बरसात के बाद जब सिंदूरी नदी में पहला पूर आया तो उसे देखने तब कोई न गया। न ही वहाँ गोताख ही दिखे। मानो खूंटा के बह जाने के बाद अगली बरसात में आए सिंदूरी नदी के पूर और उसमें बह कर आने वाले सामान से किसी को कोई मतलव ही रह गया हो ! लेकिन, पीपरपानी वाली को तो जैसे मतलब था। सिंदूरी से भी और उसमें आए पूर से भी जो गए साल अपने साथ खूंटा को बहा ले गया था।

एक रात बरसात के दिनों में ही पीपरपानी वाली नदी की ओर गई फिर न लौटी। उस रात नदी में साल का पहला पूर आया था। सुबह यह खब जेताराम ने परे गाँव को सुनाई कि पीपरपानी वाली रात से ही गायब है। न घर, गलियों में और न ही वह नदी किनारे घाट पर ही दिखती है। पीपरपानी वाली के गायब होने की खबर जब सबको पता चली तो सारे अपने आप ही सिंदूरी नदी किनारे गड़रियापुरा के उसी घाट पर जमा हो गए, जहाँ पीपरपानी वाली अक्सर बैठी दिखा करती थी। सब यह मान कर चल रहे थे कि तंग आकर पीपरपानी वाली नदी में कूद कर बह गई होगी और खूंटा की तरह, खूंटा की राह, खूंटा से मिलने के लिए उसने यह जानलेवा कदम उठाया होगा। लेकिन, फिर किया क्या जाए? सबको पता था कि पीपरपानी वाली यदि नदी की तेज़ धार में कूदी होगी तो उसे या उसकी लाश को ढूँढ़ना लगभग असंभव होगा। फिर भी फ़ैसला हुआ कि गोताखोरों का एक समूह सिंदूरी नदी में पीपरपानी वाली को जिंदा या मुर्दा तलाशने की कोशिश तो करेगा ही। लिहाजा, गोताखोरों का समूह नदी में कूद गया। इस बार जेताराम भी पीपरपानी वाली को ढूँढ़ने के लिए गोताखोरों के साथ कूद गया।

इधर, घाट पर सब उनके लौटने का इंतज़ार करने लगे और कुछ घंटों के बाद सभी गोताखोर नदी किनारे खाली हाथ लौट आए। जवाब सबको पता था, फिर भी किसी ने पूछ ही लिया कि आखिर हुआ क्या? सब गोताखोरों के बीच से जेताराम बोला कि पीपरपानी वाली को ढूँढ़ने की बहुत कोशिश हुई। लेकिन, वह न जिंदा और न मुर्दा ही मिली। जेताराम अपने आँसुओं को पोंछते हुए बोला, “खूंटा की लुगाई भी बह गई!”


श्रोत-लेखक द्वारा अपने कहानी संग्रह ‘नदी सिंदूरी’ से ‘बहता नीर’ के लिए विशेष रूप से चयनित।

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