बरसों बाद गया राँची
यहाँ स्कूल से अधिक
ट्यूशन की स्मृतियाँ थीं
ट्रेकर से उतरता था सुजाता मोड़
सुजाता और मिनी सुजाता टॉकीज़ थे यहाँ
मिनी सुजाता में लगती थीं वयस्क फिल्में
हम सुजाता घुसते हुए मिनी सुजाता वालों को ताकते थे
फिर यहाँ भयंकर आग लगी परदे पोस्टर ख़ाक
अब ऊपर मल्टीप्लेक्स नीचे चमचमाता डॉमिनोज़
चाइल्ड–फ्रेंडली थी अब यह जगह
मेन रोड के दूसरे छोर पर फिरायालाल था
पूरे बिहार में अपने ढंग का पहला मॉल
भले ही चौक का नाम अल्बर्ट एक्का चौक हो
रिक्शावाला सुनता था सिर्फ फिरायालाल
फिरायालाल प्रतीक था
मूल्यों पर बाज़ार की जीत का
जैसे राँची पर चाहे जितने कसीदे काढ़ दूँ मैं
जाना जाएगा हिंदुस्तान के नक़्शे में यह शहर
सिर्फ धोनी के छक्के से
एक पुराना स्कूल था पास
जहाँ शाम को लगते थे ट्यूशन
एक लड़की आती थी नेहा
जिसकी आवाज़ काँच जैसी थी
ठोस और तरल
मुलायम और गढ़ती हुई
नेहा बिरसा चौक उतरती थी
मैं साइकिल लेकर पहुँच जाता गली कूचा छानता
चढ़ाई में हाँफता तलाशता पेड़ की छाँह
एक दिन जब सामने आकर खड़ी हो गई
जैसे बारिश से टकराकर सिकुड़ता घोंघा—
मैं बड़बड़ाता रहा जो मन आया
जब उसने गुंडे भाई की दुहाई दी
सिर्फ इतना बोल सका—
कहो तो उसको पिटवा दूँ?
वो दिन ऐसे शहर ऐसा था
जब लड़की के नाम पर लड़ते थे लड़के
और लड़की हमारा नाम तक नहीं जानती थी
और अफवाह भी कैसे कैसे—
पटना में पेपर लीक हो गया
वो बाघ मारकर खाता है दिल्ली तक पहुँच है
नयी हॉरर देख लो— लाख रुपया इनाम
मेकॉन में धोनी आउट अम्पायर धोने चलें
एक बार मुझे मारने आए कुछ लड़के
पुराने लफ़्फ़ाज़ यार निकले
और पलटकर भागा था मेरा प्रतिद्वंदी
मैं उकताकर पढ़ाई करता फिल्में देखता
करमा पूजा में रात भर दोस्तों के साथ झूमता
विश्वकर्मा पूजा में भटकता फैक्ट्री खदान पंचर दुकान
और सोचता— हम मना रहे हैं किस बात का जश्न?
करमा और विश्वकर्मा पूजा
यहाँ के अपने परब थे
यहाँ की पहचान थे जंगल और मशीन
तीर–धनुष यहाँ की राजनीति
जगह–जगह फहरते थे लाल झंडे
अब सिमट गए झारखण्ड में जंगल और उद्योग
तीर–धनुष रह गए सजावट मात्र
और लाल रंग भी भीजकर भगवा गया
वरना करमा और विश्वकर्मा पूजा में
कबसे फूटने लगे पटाखे?
तय कर लिया था ऐसे ही किसी दिन
कि छोड़कर चला जाऊंगा राँची
और निकला भी तो क्या मिला
आगे के साल भी आंधी तूफ़ान भरे
स्कूल कॉलेज से नौकरी तक के साल
मैं डबगता रहा जैसे हाँड़ी में भात
बरसों बाद राँची लौटा
यहाँ बढ़ गई थी दीवारों की तादाद
उसी घर के सामने खड़ा जहाँ कभी रहता था
मेरा रोपा पौधा अब दीमक खाया पेड़ था
कितनी बातें मथ रही थीं एकसाथ टहटह सीना
धधकती साँस आँख मुँह में टघरता पसीना
अगर बीस साल पुराना मैं कहीं दिख जाता
उससे कुछ नहीं कहता
बस उसके साथ थोड़ा चलता
दौड़कर पकड़ता ट्रेकर बैठ जाता सामने
उसकी आँखों में आँख डालकर देखता।
राँची
संबंधित विषय – स्मृति
