संसार

वहाँ ढेर सारे बुलबुले थे
पानी की देह में कैद हवा लिए
गिरने के बजाय उड़ते
इतराते
 
जैसे इतरा रही थी उन्हें बनाकर
मेरी बेटी
 
एक कुत्ता था लपकता झपटता
बुलबुलों के पीछे भागता
वह इंतज़ार करता
कि बुलबुले उतरेंगे
जैसे बिस्कुट या रोटी के टुकड़े हों
 
लेकिन दाँत लगते बुलबुला गायब
खुला जबड़ा भौचक आँखें
कुत्ता खोजता कहाँ गया बुलबुला
 
कि बिटिया उड़ा देती फिर से
हिल जाती दुम
मानों नीयत ही तय करेगी नियति
 
मैं हँस रहा था
बिटिया को देखकर फूला न समाता
जिसके इशारे पर चल रहा था सबकुछ
 
और कोई हँस रहा था हमें देखकर
जिसके इशारे पर चल रहा था सबकुछ
 
और उसे देखकर हँस रहा था कौन
कौन जानता है।


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