आवाज़ आ रही है?
फ़ेसबुक लाइव शुरू करते हुए
विद्वतजन ने पूछा-
आवाज़ आ रही है?
और अनगिनत सहमतियों में बनी
ऊपर उठे हुए अंगूठों की आकृतियों में
मैंने भी हामी भर दी
जी हाँ ! आवाज़ आ रही है.
लेकिन तभी मैं ठिठका कि
क्या वाक़ई आवाज़ आ रही है?
कूड़े के ढेर पर बसी बस्ती में
मियाँ बीवी के झगड़े में
बेवजह पीट दिए गए बच्चे के रोने की
और, पिटने के बाद भी रसोई बनाती
किसी औरत की सिसकियों की
आवाज़ आ तो रही है.
‘अखंड राष्ट्र’ के एक हिस्से में
बीते कई सालों से
शहर की वीरान गलियों में
गश्त करती सेना के बूटों की
आवाज़ तो आ रही है.
विश्व की उभरती हुई अर्थव्यवस्था
की राजधानी में
किसी गटर को साफ़ करते हुए
दम घुटने से मर गए
संविदा सफ़ाई कर्मी की मौत पर
रोती बिलखती उसकी बेवा की
आवाज़ आ तो रही है.
तू मुझे मौला कह
मैं तुझे हाजी कहूँ
के बेशर्म नारों के बीच
सीमा पर शहीद हुए
किसी फ़ौजी के जिस्म से
बूँद बूँद कर सच के टपकने की
आवाज़ तो आ रही है.
अन्न की रिकार्ड पैदावार
और आत्मनिर्भरता की ओर
मज़बूत कदम बढ़ाते देश में
सड़क पर गिरे दूध को
कुत्ते और आदमी के एक साथ सुड़कने की
आवाज़ आ तो रही है.
लोकतंत्र के बहुरंगी गलियारे में
हिटलर के घोड़े की टापों की
और मुसोलिनी के नारों की
आवाज़ तो आ रही है.
आवाज़ तो आ रही है
कि आवाज़ें पहुँच नहीं रहीं
आवाज़ तो आ रही है
कि आवाज़ें सुनी नहीं जा रहीं
झूठी खबरों के नक्कारखाने में
सच की तूती की
आवाज़ तो आ रही है.
लेकिन ! सवाल अब भी वही है-
क्या वाक़ई आवाज़ आ रही है?
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