कम से कम

लिखता हूँ पहले मैं 
इधर-उधर हाशियों पर।

यह काम मैं अपनी कविता पर छोड़ता हूँ 
कि वह हाशियों पर लिखे गए को 
दोनों तरफ़ से सहारा देकर 
बीच में ले आए

 कविता इतना भी कर ले
 तो मैं कुछ और बन सकूँ, न बन सकूँ 
कम से कम इंसान तो बना ही रह सकूँगा।


स्रोत- ‘उदासी का ध्रुपद’ संग्रह से साभार अवनीश यादव द्वारा बहता नीर के लिए चयनित।

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