डरो!
डरो कि डरना अब वांछनीय ही नहीं
आवश्यक भी है
डरो कि वे
तुम्हें डरा हुआ ही देखना चाहते हैं
अगर स्त्री हो!
तो डरो कि
तुम्हारे बचने और तुम्हारे पढ़ने के कानफोड़ू नारों
और तुम्हारे दिनदहाड़े ज़िंदा जला दिए जाने के बीच
किसी ने नहीं सुनी तुम्हारी राख से उठती हुई सिसकियाँ?
डरो कि देशभक्त “कुलदीपकों” ने अपनी
वासना से भरे, कामुकता से लदे रथों के पहिए
मोड़ दिये हैं तुम्हारी तरफ़
अगर अल्पसंख्यक हो!
तो डरो कि
न्याय की देवी ने अपनी आँखों पर बँधी
निष्पक्षता की झीनी पट्टी भी अब खोल दी है
और वह देख सकती है साफ़ साफ़
इंसाफ़ के तराज़ू के किस पड़ले पर संख्याबल भारी है
अगर सामान्य नागरिक हो
और तुम्हारे अंदर का नागरिकताबोध कुलाँचे भर रहा है!
तो डरो कि
तुम्हें स्वयं ही देना होगा तुम्हारे होने का प्रमाण
डरो कि अब इस महादेश में बस्तियाँ नहीं होंगी
होंगे तो सिर्फ़ कैंप.
डिटेंशन कैंप, आइसोलेशन कैंप, कंसंट्रेशन कैम्प…
अच्छा! कवि हो
तो डरो कि
वे जानते हैं तुम डरते नहीं हो
डरो
कि तुम्हारी कविता झूठ बोल नहीं सकती
और सच वो सुन नहीं सकते
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