शीतल देवी

देखो द्रोण देखो-
अब बात अंगूठे तक सीमित नहीं रही 
नियति का देवता जानता था 
एकलव्य की ये नवासी 
कलयुग में 
फिर किसी राजपुत्र या पुत्री के लिए बनेगी चुनौती 
बिना बाज़ुओं के जन्मी वो शायद इसीलिए 
लेकिन देखो तो इसे 
नियति को पैर का अंगूठा दिखाती 
और उसी पैर के अंगूठे और उंगलियों से धनुष पकड़ 
दाँतों से प्रत्यंचा खींचकर 
साधा है इसने लक्ष्य 
उस व्यवस्था के सीने पर 
जिसने आरक्षित रखी तुम्हारी शिक्षा 
केवल राजपुत्रों के लिए


देखो द्रोण देखो –
इसके माथे पर भी वही तेज 
और, आँखों में वही विद्रोह है 
जैसा एकलव्य में था 
देखो इसकी रगों में दौड़ता खून 
उबाल मार रहा है 
गुरुदक्षिणा की तुम्हारी नैतिक माँग पर 
और कुलांचे भर रहा है इसका आत्मविश्वास 
ये ध्वस्त कर देगी वर्ण की वह न्यायप्रिय व्यवस्था 
जिसने जन्म के आधार पर सुरक्षित रखे सारे पद
और आवंटित किया सारा श्रम


देखो द्रोण देखो!
ये कोई साधारण लड़की नहीं 
तुम्हारी तरफ़ चलाया गया 
एकलव्य का सबसे घातक तीर है
विरोध में उठी सबसे बुलंद आवाज़ है 


1 1 vote
रेटिंग
guest
0 प्रतिक्रियाएँ
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x