नदियों का बचना
इसलिए जरूरी नहीं कि
मल सकें उसमें
हम अपनी बेजान देह;
उसका बचना केवल
इसलिए जरूरी नहीं कि
हम मिटा सकें तृष्णा
झुलसती दुपहरी में,
या पखार सकें
अपना पूरा घर;
कर सकें पुरखों का श्राद्ध
और मुक्ति की कामना !
उसे बचना जरूरी है कि
जब बेपरवाह शहर
हमें खदेड़ना शुरू कर देगा;
साइरन हमारा जीना
दुर्भर कर देगा;
कि धौंक से-
अकुलाने लगेगा इलाका
पलभर एकांतता की ठोह
ढूंढेंगी जब बेचैन आंखें;
तब नदियाँ बरबस बुलाएँगी !
ऐसे समय जबकि
हर कोई कुछ कहने से झेंपता है
कुछ भी देने को हामी नहीं भरता कोई;
नदियाँ आज भी दे रहीं हैं
मुझे खुला आसमान
देखने को-
पूर्णिमा का पूरा का पूरा चाँद।
संबंधित विषय – नदी

प्रस्तुत कविता में कवि यह कहना चाह रहे हैं की नदियां ही एक ऐसी जगह है जहां लोग कब्जा नहीं कर सकते मकान नहीं बना सकते क्योंकि नदियां उसे बाहा ले जाएगी और वही आज के जमाने में ऐसा जगह बच गई है जहां खुलेपन का आनंद लिया जा सकता है जहां नेचर को महसूस किया जा सकता है जहां प्रकृति के करीब आदमी अपने आप को पा सकता है परंतु कभी ऐसा क्यों कह रहे हैं कि से बचना जरूरी है शायद इसलिए कह रहे हैं कि अब नदियां का स्पेस भी लोग अपने कब्ज में ले रहे हैं नदिया में भी मकान बना रहे हैं भले ही वह बाढ़ के समय क्यों ना टूटजाए नदिया में भी शांति नहीं मिल रही है वहां भी सायरन बज रहे हैं प्रश्न यह है कि आखिर वहां सायरन क्यों बज रही है वहां इतना हलचल क्यों है वहां नदियों की रेत की चोरी हो रही है नदिया का रेत वहां खत्म हो रही है अर्थात बहुत हलचल है कविता अति सुंदर