नदियाँ बची रहें आसमान के लिए

नदियों का बचना
इसलिए जरूरी नहीं कि
मल सकें उसमें
हम अपनी बेजान देह;
उसका बचना केवल
इसलिए जरूरी नहीं कि
हम मिटा सकें तृष्णा
झुलसती दुपहरी में,
या पखार सकें
अपना पूरा घर;
कर सकें पुरखों का श्राद्ध
और मुक्ति की कामना !

उसे बचना जरूरी है कि
जब बेपरवाह शहर
हमें खदेड़ना शुरू कर देगा;
साइरन हमारा जीना
दुर्भर कर देगा;
कि धौंक से-
अकुलाने लगेगा इलाका
पलभर एकांतता की ठोह
ढूंढेंगी जब बेचैन आंखें;
तब नदियाँ बरबस बुलाएँगी !
ऐसे समय जबकि
हर कोई कुछ कहने से झेंपता है
कुछ भी देने को हामी नहीं भरता कोई;
नदियाँ आज भी दे रहीं हैं
मुझे खुला आसमान
देखने को-
पूर्णिमा का पूरा का पूरा चाँद।


4.7 3 votes
रेटिंग
guest
0 प्रतिक्रियाएँ
Inline Feedbacks
View all comments
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x
0

Subtotal