नदियाँ बची रहें आसमान के लिए

नदियों का बचना
इसलिए जरूरी नहीं कि
मल सकें उसमें
हम अपनी बेजान देह;
उसका बचना केवल
इसलिए जरूरी नहीं कि
हम मिटा सकें तृष्णा
झुलसती दुपहरी में,
या पखार सकें
अपना पूरा घर;
कर सकें पुरखों का श्राद्ध
और मुक्ति की कामना !

उसे बचना जरूरी है कि
जब बेपरवाह शहर
हमें खदेड़ना शुरू कर देगा;
साइरन हमारा जीना
दुर्भर कर देगा;
कि धौंक से-
अकुलाने लगेगा इलाका
पलभर एकांतता की ठोह
ढूंढेंगी जब बेचैन आंखें;
तब नदियाँ बरबस बुलाएँगी !
ऐसे समय जबकि
हर कोई कुछ कहने से झेंपता है
कुछ भी देने को हामी नहीं भरता कोई;
नदियाँ आज भी दे रहीं हैं
मुझे खुला आसमान
देखने को-
पूर्णिमा का पूरा का पूरा चाँद।


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3 प्रतिक्रियाएँ
Rahul Kumar Roy
Rahul Kumar Roy

प्रस्तुत कविता में कवि यह कहना चाह रहे हैं की नदियां ही एक ऐसी जगह है जहां लोग कब्जा नहीं कर सकते मकान नहीं बना सकते क्योंकि नदियां उसे बाहा ले जाएगी और वही आज के जमाने में ऐसा जगह बच गई है जहां खुलेपन का आनंद लिया जा सकता है जहां नेचर को महसूस किया जा सकता है जहां प्रकृति के करीब आदमी अपने आप को पा सकता है परंतु कभी ऐसा क्यों कह रहे हैं कि से बचना जरूरी है शायद इसलिए कह रहे हैं कि अब नदियां का स्पेस भी लोग अपने कब्ज में ले रहे हैं नदिया में भी मकान बना रहे हैं भले ही वह बाढ़ के समय क्यों ना टूटजाए नदिया में भी शांति नहीं मिल रही है वहां भी सायरन बज रहे हैं प्रश्न यह है कि आखिर वहां सायरन क्यों बज रही है वहां इतना हलचल क्यों है वहां नदियों की रेत की चोरी हो रही है नदिया का रेत वहां खत्म हो रही है अर्थात बहुत हलचल है कविता अति सुंदर

Last edited 8 months ago by Rahul Kumar Roy
Dhananjay Singh
Dhananjay Singh

अतिउत्तम

Shaili Singh
Shaili Singh

Bahut hi khoobsurat kavita….sabdho ka chayan aur bhi accha

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