बसंत के आगमन में

बसंत के आगमन में
उड़ रही होती है-
धूल!
झड़ रही होती हैं-
फागुन की बेजान पत्तियाँ
और मक्कड़-जाल
बन रहे होते हैं!
हिल-डुल रही होती हैं-
दादाजी की हस्तनिर्मित खिड़कियाँ
फड़फड़ा रहा होता है-
पिंजरे का रट्टू तोता!
प्रायः की तरह चलता है-
वैसे ही अनबन बाबूजी से
स्वादहीन कविताएँ-
उसी दौरान लिखी जाती हैं।
मोटरों का सर्राटेदार दौड़-
जारी रहता है
ब्रेक, हार्न के भरोसे!
और धूप-
थोड़ी तीखी, असह्य पड़ती है
सीधे मेरे चिकने गालों पर!

पर भोर-भोर में-
नहीं फुदकती है गौरैया,
अटारी पर, छतों पर
नहीं चुगती है गौरैया
कटोरे में रखे,
मुट्ठी भर फेंके दाने को।


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