मैं उन दिनों उल्लास से देखा था
जब तुम देहरी पर
अपनी चंचलता बिखेर रही थी
हवा की धीमी बहाव में
बहा रही थी अपने शोखीपन को
आँखों में इंद्रधनुषी तरलता थी
और परों में स्वछंद उड़ान
आज मैं भावहीन कौतुहलता से
देख रहा हूँ
उस रिक्त स्थान को
परम्परा की ढलान को
मेरा उत्साह, मृतकाय
शौकगीत गा रही है
तुम्हारी अनुपस्थिति से
उत्पन्न उदासी
अनंत पीड़ा में नहा रही है।
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