
बदलते समय के साथ अध्यापक–अध्यापिका के कार्य में निरंतर बदलाव आए हैं। उनकी सामाजिक मान्यताओं और धारणाओं में भी परिवर्तन हुआ है। सदियों पहले यह एक छोटा-सा कार्य माना जाता था, आज यह सरकारी जिम्मेदारी बनकर बहुत बड़ा हो गया है। पुराने समय में लोग शिक्षकों को अत्यंत ज्ञानवान मानते थे और उनकी बातों को श्रद्धा से सुनते थे। उस समय शिक्षकों पर किसी का नियंत्रण नहीं था कि उन्हें क्या पढ़ाना है और क्या नहीं।
अलग विचारों और स्वतंत्र सोच के कारण शिक्षकों को दंड भी भुगतना पड़ा है। सुकरात को विष देकर मार दिया गया, प्लेटो को जेल में डाला गया, हिपेशिया को सार्वजनिक रूप से नग्न कर हत्या की गई, और सावित्रीबाई फुले पर गोबर फेंका गया। इन सब सामाजिक प्रताड़नाओं के बावजूद उनके विचार संसार के कोने-कोने तक पहुँचे। एक सच्चा अध्यापक या अध्यापिका समाज से क्या चाहता है? केवल यही कि लोग उसके विचारों, ज्ञान और उसकी पुस्तकों से प्रभावित हों न कि उसकी वेशभूषा या भौगोलिक स्थिति से।
एक समय था जब पढ़ाई-लिखाई पर केवल चर्च या धर्मालयों का अधिकार था। इस कारण लोगों की बुद्धि और सृजनशीलता का विकास नहीं हो पाया। लेकिन जब नवजागरण का दौर आया, तब शिक्षकों को स्वतंत्रता मिलने लगी पर शिक्षकों पर इस बखत भी इनके विचारों के कारण कई वैज्ञानिकों को कोपरनिकस, जियोर्दानो और गैलीलियो गैलीली जैसे विद्वानों को अपने विचारों के कारण मुसीबत झेलनी पड़ी और जान भी गवानीन पड़ी। लेकिन इस स्थिति में भी इन्होने ने वैचारिक स्वतंत्रता और तर्क को आगे बढ़ाया और ज्ञान की नई राहें खोलीं। यह वह समय था जब शिक्षा केवल धार्मिक आदेशों का पालन नहीं रही, बल्कि मानव की जिज्ञासा और सृजनशीलता का विस्तार बनने लगी।
धीरे-धीरे शिक्षा का स्वरूप समाज और राष्ट्र की ज़रूरतों से जुड़ने लगा। औद्योगिक क्रांति के बाद शिक्षण पर इसका बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ा जो मानव सभ्यता में अब तक ज्ञान के अधिकार और धारणा को बदलने लगा। पर भारत अभी भी इससे बहुत दूर रहा था। यहाँ का नवजागरण भी ना के ही बराबर रहा और औद्योगिक प्रभाव वाली शिक्षा भी देरी से ही आई पर गज़ब ही आयी।
भारत का मानव भूगोल अपने आप में एक व्यापक और समृद्ध मानव भूगोल है। इसकी व्यापकता की गहराइयों में असमानता और अंधविश्वास की जड़ें भी काबिज हैं। यह जीवंत यथार्थ है अगर हमने इसे अनदेखा किया तो भारत का तस्वीर धुंधला और एकतरफा हो जाता है। आज हमारे देश के युवाओं में रोजगार का जो संकट है, समाज में फैली असमानता और महिला उत्पीड़न का जो संकट है इन सबकी जड़ें बहुत गहरे में सदियों से व्याप्त असमानता, अंधविश्वास के प्रकोप और तर्कशीलता के अभाव के कारण में ही रहा है। ऐसे में जब हम इक्कीसवीं सदी के रथ पर सवार हैं तब यह सवाल प्रखर और अगुआ सवाल के रूप में हमारे सामने उभरता है कि भारत जैसे समाज में शिक्षा कैसी हो और शिक्षक – शिक्षा प्रणाली और प्रक्रिया कैसी हो?
भारतीय समाज में व्याप्त सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक विरोधाभासों के बीच ज्योतिबा फुले और अंबेडकर के सपनों के शिक्षक–शिक्षिकाएँ कैसी हों और वे किस तरह की शिक्षा के सारथी बनें? यह प्रश्न केवल शिक्षा का नहीं, बल्कि भारतीय समाज की आत्मा का सवाल है। इस उत्तेजक और कारगर दृष्टिकोण पर यह लेख एक रास्ता सुझाता है। एक ऐसा रास्ता जो भारत के आत्म में बसे भूतों से निपटने का साहस और सृजनशील प्रवाह बनाता है। यह वैचारिक धरातल में बीज के अंकुरण की दिशा में इशारा करता है।
ज्योतिबा फुले ने किसानों के लिए, जाति और समाज में व्याप्त गहन असमानताओं के लिए, अनाथों के लिए और बालिका शिक्षा के लिए अनेक स्तरों पर कार्य किए। उनके ये प्रयास ठोस प्रमाण हैं कि समानता, तर्क और शिक्षा से ही समाज की जड़ें हिल सकती हैं और भूतिया परंपराएँ उखाड़ी जा सकती हैं। देश के घोर कठोर परिस्थिति को बदलने के लिए अध्यापक और अध्यापिकाओं को शिक्षा की ज़मीन को उर्वरा बनाना होगा। इसी दिशा में ज्योतिबा के विचारों का आज के समय में रूपांतरण और नेतृत्व की आवश्यकता है।
भारतीय समाज में शिक्षा क्यों ज़रूरी है
भारतीय समाज में शिक्षा क्यों ज़रूरी है यह नया विचार नहीं बल्कि आज दुनिया के बदलते स्वरूप में इस सवाल को फिर से ताज़ा करने और मार्ग खोजने की ज़रूरत है। भारतीय यथार्थ को समाने रखते हुए इसे बुनने की ज़रूरत है। इस दिशा में पूर्व में हुए कार्य हमारे मार्ग प्रदर्शक रूप में हमारे समाने उदाहरण के स्वरूप मौजूद रहे हैं। शूद्र, अतिशूद्र और महिलाओं के लिए शिक्षा का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। इस दिशा में हुए शुरुआती ठोस प्रयास लगभग डेढ़ सौ साल पहले ज्योतिबा के समय के हैं। अंबेडकर ने इन्हें अपनी प्रज्ञा से भारतीय संविधान का स्तंभ बनाया है।
भारत में असमानता, अंधविश्वास और अशिक्षा की जड़ें इतनी गहरी हैं कि वे खत्म होने का नाम ही नहीं लेतीं। आज यह और भी कठिन होती जा रही हैं। शिक्षा सदा से धनपतियों और कुलीनों के हाथ का औजार रही है, जो केवल जीवन की आम ज़रूरतों को पूरा करने तक की शिक्षा को साधन के रूप में देखती रही हैं। इस कारण भारतीय समाज की चुनौतियाँ और गहराई में जाती रही हैं। संस्थाएँ समता के एजेंडे पर काम कर रही हैं, पर भारतीय आत्म में बसे असमानता के भूत से निपटने में वे नाकाफी साबित हो रही हैं। विद्यालयी स्तर पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की आधारभूत सिफ़ारिशें संविधान द्वारा परिकल्पित समावेशी और बहुलतावादी समाज के निर्माण में अपेक्षित योगदान नहीं दे पा रही हैं। विद्यालयों में अभी भी विद्यार्थियों के साथ भेदभाव होता है, और शिक्षक–शिक्षिकाओं के बीच भी सामाजिक – सांस्कृतिक विभाजन मौजू है। इस यथार्थ में विद्यालय किस तरह का उदाहरण बना पाएंगे? विद्यार्थियों को क्या अनुभव होगा, बंधुता, समानता और बराबरी अंगीकार इसके व्यवहार से रूपांतरित होती है। इसके बरक्स विद्यालय शिक्षा के नए प्रयोग इस पर टिके हैं कि बच्चा बस गिनना और भाषा में लिखना–पढ़ना सीख ले। ऐसे परिवेश में शिक्षा से समूचा जीवंत समाज ही गायब है। तब समता और समानता, तर्क और शिक्षा के नीतिगत मायने कैसे पूरे होंगे? यह एक विराट संकट है जो संविधान को चुनौती देता है।
शिक्षा में सामाजिक जीवन का निवेश
इस धरातलीय यथार्थ से निपटने के लिए शिक्षक–शिक्षा में सामाजिक जीवन का निवेश करने से गणित केवल गिनना नहीं, बल्कि समाज के संबंधों की पड़ताल और उनके आपसी अंतरसंबंधों को उजागर करने वाला होने लगेगा। भारत जैसे देश में गणित की प्रक्रिया क्या हो? क्या केवल अंकों से वस्तु तक जाना या वस्तु से अंकों तक जाना बस इतना ही रह गया है या भारतीय सामाजिक यथार्थ की गणित प्रक्रिया यहाँ के सामाजिक संदर्भों से गुंथित हो? कक्षा में बच्चा भाषा पर कैसे प्रयोग करे इसका संदर्भ क्या हो? विद्यार्थी भाषा को कैसे बरतें, समाज की समानता – विविधता को भाषा में कहाँ से कैसे प्रयोग करे, कैसे इसकी पड़ताल करे का जरिया हो? ना की कहानी का दोहरान।
भारतीय समाज की समस्या असमानता, महिला शिक्षा की उपेक्षा, बराबरी की कमी और अंधविश्वास अब भी बदस्तूर जारी है। यह अब और भी संकटपूर्ण हो गया है क्योंकि यह राजनीति में लिपटे भाषणों का हिस्सा बन गया है। लोकतन्त्र में जब भी असमति के स्थान को समूल नष्ट किया जाता रहा है, इसका सीधा प्रभाव विद्यालय पर भी पड़ा है। विद्यालय के विद्यार्थियो पर भी पड़ा है, विद्यालय के समुदाय पर भी पड़ा है और विद्यालय के शिक्षकों पर भी आखिर पड़ा ही है उनकी शैक्षणिक तैयारियों और नज़रिये पर भी तो पड़ा ही है।
शिक्षक–शिक्षा की वर्तमान स्थिति और समभावनाएँ
भारतीय समाज में पहले से चली आ रही व्यापक असमानताएँ और अंधविश्वास और अब आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के आज बदलते परिवेश में भारत के शिक्षक–शिक्षा की स्थिति और भी गहरा मुद्दा होना है। इन दोनों परिस्थितियों का सामना करने के लिए शिक्षक – शिक्षिकाएँ कितनी तैयार है? सृजनशीलता, कल्पनाशीलता और तर्कशीलता शिक्षक–शिक्षा के केंद्र में हो, जहां वह बहुलतावादी समाज और देश में प्रत्येक स्तर पर व्याप्त असमानताओं को समझ इस पर कार्य कर सकें। पर इसके विपरीत शिक्षक बने–बनाए सामग्रियों के इस्तेमाल में जुट रहा है, जैसे शिक्षकों को हैंडबुक और इसकी गतिविधियों को करवा देने वाला एक व्यक्ति तक सीमित कर दिया गया है या सीमित हो रहा है। शिक्षक–शिक्षा की नींव ऐसे प्रयोगों से कमजोर हुई है। शिक्षक की सृजनशीलता के अवसर जिस तरह नदारद हुए हैं और इसकी उपेक्षा हुई है इसने शिक्षकों के कार्य और पहुँच को धुंधला ही किया है और इसने भ्रामक स्थितियाँ पैदा की हैं। इसके कारण सामाजिक–सांस्कृतिक–शैक्षणिक संस्थाओं के द्वारा शिक्षक को प्रोपेगेंडा का वाहक बनने के संकट के सामने ला खड़ा कर दिया है। एक थका हुआ शिक्षक और प्रोपेगेंडा के तिलस्म में फंसा शिक्षक, भारत जैसे देश में यथार्थ से उबरने के स्थान पर रूढ़ियों को ही खड़ा करता रहता है। जबकि ज्योतिबा और सावित्री फुले ने अपने समय की गहरी चुनौतियों से सामना करने की तैयारी भी की और इसमें से मार्ग भी निकाला। ऐसे ही कई पश्चिम के शिक्षकों ने भी अपनी तात्कालिक सामाजिक यथार्थ की चुनौतियों की पड़ताल की, ऊर्जा और मार्ग प्रशस्त किए। नए ज्ञान के जरिये सत्य को खोजने के रास्तों को उर्वर भी किया।
किसी भी समाज में समता–समानता–विविधता और बहुलता के अभ्यास के लिए सर्वप्रथम कल्पनाशीलता और सृजनशीलता जैसे गुणों की आधारभूत ज़रूरत होती है। बस के बगल वाली सीट पर बैठा सहयात्री एक इंसान है यही इसका पहला संदर्भ है। सर्वप्रथम इसकी कल्पना और अनुभव होना बेहद ज़रूरी है और उस सहयात्री के अपने विचार होंगे, उसका अपना भूगोल होगा इस पर विश्वास करने के लिए भी कल्पनाशीलता और रचनाशीलता की ज़रूरत पड़ती। तब कहीं तर्क की खेती हो सकेगी। हमे यह समझना भी होगा की रूढ़ियाँ दोहराव में होती हैं और यह सृजनशीलता और कल्पनाशीलता की कट्टर होती है। वो हर नए का प्रवेश अवरोध करती है। हम शिक्षकों को रेडीमेड मटीरियल उपलब्ध करा रहे हैं। यह वैसा ही है जैसे परीक्षार्थी परीक्षा के दिनों में बाज़ार से रेडीमेड उत्तर–कुंजी का उपयोग करते हैं। यह शिक्षक शिक्षा को कहाँ ले जाएगा? क्या दिशा देगा?
शिक्षक जब छात्र था तब भी उसे भारत के यथार्थ के भीतर जाने का इसकी पड़ताल का समान्यतः अवसर नहीं मिला और जब वह आज शिक्षक–शिक्षिका है तब भी उसे इसका अवसर नहीं मिल रहा है। तब यह सवाल मुखर होता है कि भारत में शिक्षक–शिक्षा का नज़रिया क्या हो? जब शिक्षक के कंधे पर सामाजिक भूतों का दबाव है, तब वह कक्षा में पहुँचकर कैसे कार्य करे? उसके लिए गणित क्या हो, सामाजिक विज्ञान की धारणा क्या हो, और भाषा को देखने–बरतने का नज़रिया क्या हो?
क्या ज्योतिबा और अंबेडकर के भारतीय दृष्टिकोण को संविधान के हृदय–स्पंदन में प्रवाहमान बनाया जा सकेगा? भारत में शिक्षक–शिक्षिकाओं के पास किस तरह के आधारभूत अभ्यास और दृष्टिकोण हों और यह कैसे रूपांतरित हो? यह सवाल आज और भी मौजू है। वे शिक्षक–शिक्षिकाएँ जिनका स्वयं समानता पर अभ्यास और कक्षा में इसे ले जाने के अवसर हों, व्यक्तिगत जीवन और कक्षा के बर्ताव में अंधविश्वास को दूर करने वाले हों और शिक्षा को सृजनशील और रचनाशील बनाने का माद्दा रखने वाले हों। यह माद्दा देश के यथार्थ के भीतर फंसे समानता और तर्कशीलता को बाहर ला सकने में शिक्षक – शिक्षिकाएँ को मदद कर सकेगा।
यह शिक्षक – शिक्षिकाएँ जब भी बच्चों के सामने उपस्थित होंगे उन्हे यह गहरी समझ होगी की वह विषय के चक्रव्युह के भीतर पहले समानता – तर्क और अंधविश्वास पर कार्य कर रहा है। यह इनका पहला अनिवार्य पाठ्यक्रम है और यह ज्योतिबा और अंबेडकर के सपनों का अध्यापक है।
