
गुरु गोरखनाथ नाथ संप्रदाय के संस्थापक और एक महान योगी थे, जिन्होंने हठ योग की परंपरा को व्यवस्थित और लोकप्रिय बनाया।
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परिचय
कविता
गोरखनाथ की सम्पूर्ण रचनाएँ
जीवन परिचय
गोरखनाथ के जीवन और काल के संबंध में विद्वानों में मतभेद है, और उनका व्यक्तित्व पौराणिक कथाओं और किंवदंतियों से भरा हुआ है।
काल: विद्वानों के अनुसार उनका समय 11वीं या 12वीं शताब्दी ई. के आसपास माना जाता है। कुछ प्रमाण उन्हें 9वीं शताब्दी से 14वीं शताब्दी के मध्य भी बताते हैं।
जन्म और उत्पत्ति: उनके जन्मस्थान के बारे में विभिन्न मान्यताएँ हैं, जैसे कि पंजाब, गोदावरी नदी का तटवर्ती चंद्रगिरि (महाराष्ट्र/आंध्र), नेपाल या उत्तर प्रदेश। कई किंवदंतियों के अनुसार, वह अयोनिजा (सामान्य माता-पिता से उत्पन्न नहीं) थे और उन्हें भगवान शिव का अवतार माना जाता है।
गुरु: वह नाथ संप्रदाय के आदिनाथ (शिव) के शिष्य परंपरा में आने वाले मत्स्येन्द्रनाथ (मच्छंदरनाथ) के प्रमुख शिष्य थे।
कार्यक्षेत्र और प्रभाव: उन्होंने पूरे भारत का भ्रमण किया और नाथ संप्रदाय का व्यापक रूप से प्रचार-प्रसार किया। उनके नाम पर उत्तर प्रदेश के गोरखपुर नगर का नाम पड़ा है, जहाँ उनका प्रसिद्ध मंदिर (गोरखनाथ मंदिर) स्थित है।
दर्शन और शिक्षा: उन्होंने तत्कालीन समाज में फैली कुरीतियों, अंधविश्वासों, और जटिल धार्मिक मतभेदों को दूर किया। उन्होंने सहज समाधि को असली मोक्ष माना, जिसमें मन स्वयं ही मन को देखने लगता है। उनकी शिक्षाओं में हठ योग, गुरु महिमा, इंद्रिय निग्रह (संयम), प्राण साधना, वैराग्य, और सदाचार पर विशेष बल दिया गया है।
महत्व: आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने उन्हें शंकराचार्य के बाद भक्तिकाल से पहले भारतीय लोकमत को सबसे अधिक प्रभावित करने वाला आचार्य कहा है। निर्गुणमार्गी भक्ति शाखा (जैसे कबीर) पर भी उनका गहरा प्रभाव दिखाई देता है।
विशिष्ट रचनाएँ
माना जाता है कि गोरखनाथ ने लगभग चालीस छोटी-बड़ी रचनाएँ लिखी थीं, लेकिन इनकी प्रामाणिकता को लेकर विद्वानों में संदेह रहा है। डॉ. पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल ने गोरखनाथ की 13 रचनाओं को प्रमाणिक मानते हुए उनका संकलन ‘गोरख बानी’ नाम से किया है।
इनमें से प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं:
हिंदी/लोक भाषा की प्रमुख रचनाएँ (गोरख बानी में संकलित)
ये रचनाएँ मुख्य रूप से दोहा और पद शैली में हैं, जिनमें नाथपंथ के उपदेश और योग साधना का वर्णन है:
सबदी (सर्वाधिक प्रमाणिक मानी जाती है)
पद
प्राण संकली
शिष्या-दर्शन
नरवैबोध
आत्मबोध
अभै मात्रा जोग
पंद्रह तिथि
सप्तवार
ज्ञान चौंतीसा
अष्टपारछ्या
संस्कृत ग्रंथ (अन्य रचनाएँ)
कुछ महत्वपूर्ण संस्कृत ग्रंथ भी गोरखनाथ से संबंधित माने जाते हैं जिनमें हठ योग और तंत्र-दर्शन का समन्वय है:
सिद्ध सिद्धांत पद्धति (Siddha Siddhanta Paddhati): इसमें नाथ योग और दर्शन का विस्तृत विवरण है।
गोरक्ष संहिता (Goraksha Samhita)
योग बीज (Yoga Bija)
गोरक्ष शतक (Goraksha Shataka)
महार्थ मंजरी (Mahartha Manjari)
इन रचनाओं में कुंडलिनी जागरण, नाद और बिंदु साधना, शून्य समाधि, और हठयोग के विभिन्न अंगों का विवेचन किया गया है।
गोरखनाथ की कविताएं
