आप क्या जानो साहेब

हरियाली अमराई
पौधों की मुहब्बत, उनकी बाहों के झूले

गुलमोहर के छतनार दरख़्त
जिसकी छाया सघन
भरी दोपहरी में छहाँते लोग
पत्तियों की झुरमुटों से
सूरज की आंख मिचौनी

आप क्या जानो साब

महलो में पलने वाले
बन्द गाड़ियों में दौड़ने वाले
आप तो बस
सड़कें चौड़ी कराओ।


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Sanjeev
Sanjeev

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