अनुप्रास

जिस्म लावा हुआ जाता है 
यह कौन सा दौर है 
कि बसंत बगीचों को छोड़कर
धीरे धीरे देह में उतरता जाता है 

कर्ज है जिन आंखों में बारिशों का 
हर्ज नही हुआ उन्हे कभी बादलों की गर्जना से 
खुदगर्ज बना दिया है कुछ वर्जनाओं ने 
इस तर्ज पर एक जैसा है बारिश और बसंत का दर्द 

मर्ज़ मर्ज़ी से नहीं आता जाता 
सुई के हर चरण को दर्ज करने वाला दर्ज़ी  
ज़ख़्म सिलने का हुनर नही जानते 
क्या कमाल है कि फ़र्ज़ी कहे जाने वाला आदमी 
कोई फ़र्ज़ पूरा नहीं करता 
सिर्फ अर्ज़ी है जो ईमानदारी से अर्ज़ करना जानती है
और तमाम धूर्तताओं के बीच 
आदमी को आदमी बनाए रखती है


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