बहादुर बेटियाँ

1

गांव के ओरे- छोरे
गिरे पड़े, घर के कूड़ा करकट भरे
आँगन दुआर के
गाल पर हाथ धरे बैठी
कितनी – कितनी बाते
कितने कितने सपने
तन के कपड़े फटे
बाल रूखे सूखे बिखरे बिखरे
और चितवन?
चितवन रोज के एकाकी असहाय निरुपाय जीवन की
भावनाओं से बोझिल बोझिल
भारी भारी सी है
महुए के फूल की गंध सी
महमहाती पवन को निहारती
कहते हैं लोग इन्हें
गरीब घर की बेटियां।

2

तेज़ गति से बहता
चंचल अविरल वेगधारा झरना
कुछ भय कुछ उत्सुकता से
पत्थरों पर धीरे धीरे पांव रखती
एक नृत्य के साथ बैठ जाती
बहते पानी में खिलवाड़ करतीं
कहते हैं लोग इन्हें
गरीब घर की बेटियां।

3

पत्थरों से रिसता है पानी
जैसे हथेलियों में बंद हथेली
प्रेम से लबालब उस पार तक फैला समुंदर
सीमाहीन चट्टानों पर खड़ी इमारत
सदियों से थपेड़े सहती
अलौकिक आकाश सबको समेटे फैला हुआ
और जैसे खुद को पाने की ईप्सा में वहां पहुंची
निशब्द खामोश,
कहते हैं लोग इन्हें
गरीब घर की बेटियां।

4

समंदर किनारे
शंखों सीपियों से बने
चाभियों के गुच्छे,कंगन,मालाएं लिए
सूखे मुरझाए चेहरे बड़ी बड़ी आंखे और
स्मित हंसी लिए
हर आने जाने वालों के पास
बाबू ले लो न बाबू ले लो न करतीं
कहते हैं लोग इन्हें
गरीब घर की बेटियां।


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Sanjeev
Sanjeev

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