बथुई

बोये बिना ही उगती है
सरसों, गेहूँ में, आलू में कहीं अलसी में
छूट गये खेत के किसी बरहे में
धूप, नमी, मिट्टी और ओस की यारी में 
खर-पतवार होने की निरर्थक ख़ुमारी में।

दोपहर बाद जाती है स्त्रियों की टोली बथुई बीनने
अपनी धोती के आँचल भर-भर के लौटती हैं
बटुई में चुरयती हैं सगपहिता और करहिया में साग
जगा देती हैं खाने वाले के भाग।

माँ जब खोटती है बथुई
तो ऊपर का बस नर्म हिस्सा अल्पा
जड़ से नहीं उखाड़ती
जड़ से उखाड़ा बथुआ तो बजार में ही बिकता है
बजार का तो काम ही है जड़ से उखाड़ना।

संझा को जब माँ लौटती है बथुई बीनकर
तो क्षितिज पर धुन्ध की नीली लोई 
ओढ़ने की तईं झाड़ता है सूरज
तनिक दूर तक पीछे-पीछे आता है
देखने कि कोंछे में चार मुट्ठी घास लिये
ये स्त्री कहाँ चली जा रही है ?

मेरी माँ के परबी किस्से में
धन की देवी अब भी उसी आँगन जाती है
जहाँ नैवेद्य बनकर चढ़े हैं बथुई के लड्डू
मेवे के लड्डू तो देवी चखकर ही छोड़ देती है।


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ज्योति रीता
ज्योति रीता

सुंदर कविता।

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