धुंआ

हर फ़िक्र को धुएं में उड़ाता चला गया
चेतना रूपी तूफान आया
देखा वहीं धुआं मेघ बनकर
नैन रूपी आसमां पर छा गया है
एकदम शुष्क
कहीं कोई नमी नहीं
आंखें नीर की क्षीर होती जा रहीं हैं
मैं चाहता हूं कि
इसी क्षीरसागर में गोता लगा दूं
कोई फायदा नहीं
मल्लाह हूं
कर्म से नहीं—जाति से
कुछ तो पुरखों का कर्म रक्त
मेरी धमनियों में बह ही रहा है
डूबूंगा नहीं
मैं चाहता हूं‌
डूब जाऊं


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2 प्रतिक्रियाएँ
Vasundhara Pandey
Vasundhara Pandey

सुंदर

सौरभ
सौरभ

बहुत बेहतरी।

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