वह ढूँढता रहा धूल के कणों में अपना वजूद
किताबों की स्याही में छिपे न्याय का अक्स
उसे प्यार था सितारों से, उनकी खामोश चमक से
पर उसे क्या पता था…
कि यहाँ ज़मीन पर,
इंसानियत ने प्रकृति से तलाक़ ले लिया है
वह सितारों का बेटा था-
जो एक पिंजरेनुमा कमरे में,
सांस्थानिक बेड़ियों के बीच घुट रहा था।
जहाँ डिग्री से पहले ‘जाति’ पूछी जाती है,
जहाँ शोध से पहले ‘औकात’ तौली जाती है।
वहाँ एक आज़ाद परिंदा और क्या करता?
हमारी भावनाएं अब ‘डिस्काउंट’ पर बिकती हैं,
हमारा प्रेम—एक पॉलिश किया हुआ झूठ है।
वह कहता रहा कि वह एक ‘इंसान’ है,
पर हम उसे ‘पहचान’ के खांचों में बाँटते रहे।
उसकी मौलिकता को ‘कृत्रिम’ बताते रहे,
और उसके सपनों को कागजों की रद्दी में फेंकते रहे।
विश्वविद्यालय की उन ऊँची दीवारों ने,
सिर्फ़ ज्ञान नहीं दिया, कुछ गहरे घाव भी दिए।
वहाँ बहसें तो हुईं, पर संवेदनाएं मर चुकी थीं,
वहाँ शोध तो हुए, पर रूह का सुकून कहीं खो गया था।
वह दुखी था, क्योंकि वह प्रेम करना चाहता था,
पर इस बनावटी दुनिया में, प्रेम की कीमत सिर्फ ‘पीड़ा’ थी।
वह चला गया… सितारों के पास वापस,
क्योंकि धरती के लोग अब सितारों की भाषा भूल चुके हैं।
वह अब एक ‘वोट’ नहीं, एक ‘नक्षत्र’ है,
जो हर रात हमारी झूठी मान्यताओं को चिढ़ाता है।
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