फूटा घड़ा

एक

शोक में डूबा हुआ शहर
थके हुए लोग
ढ़ीली पड़ चुकी हड्डियां
मिमियाती हुई आवाजें
बुझी हुई शामें और सुबहें
सब थम सा गया है
पड़ चुकी है मद्धिम रोशनी
दूर कहीं कुत्ता रो रहा है
आ रही है सियार के हुआने की आवाज
मैं सोचता हूं
पीछा करूं इन आवाजों का
जानना चाहता हूं
कहां तक पहुंचा है
शोक संदेश।

दो 

शोक में डूबे हुए शहर में
क्या कोई बसंत आ सकता है?
कत्तई नहीं आ सकता है
इस शहर में बसंत नहीं आया
बसंत आने का समाचार आया है
धूप की तपन इतनी है कि—
पीठ पर अभी से कोड़े पड़ रहें हैं
जेठ की सोचकर ही
मन सिहर जाता है
बसंत कहीं बीच रास्ते में ही अटक गया
आ तो बड़े जोर-शोर से रहा था
अपशकुन हो गया
इसे रोका जा सकता था
बनाया जा सकता था रास्ता
बसंत के आने का
बसंत तुम मत आना
श्रापों के देस में
तुम आओगे
पाओगे कि
यहां खिलने वाले सभी फूल
मुरझा गए हैं
बिना फूल
तुम्हारा कोई अस्तित्व भी होगा?

तीन

शहर में धूल ही जीवन है
भरी हुई है लोगों की जेबों में धूल
चेहरा धूल से ओजित
धूल आभासी कोहरे का आभास करा रही है
वापस जाती शरद में
फूल पर कहर बनकर टूटी है
सांसों में आक्सीजन कम
धूल ज्यादा है
यहां से चांद दिखाई देता है मटमैला
उसका ओज धूल फांक रहा है
धूल-धक्कड़ में जिंदगी
बुझक्कड़ हो गई है
सोचता हूं
अब क्या होगा मेरे शहर का?

चार 

चुप्पियों का संसार आबाद है
ये चुप्पियां बोलना चाहती हैं
चीखना चाहती हैं
चीखना तो दूर
ये मिमिया भी नहीं सकती हैं
लटक रही है‌ इनके गले में
बिल्ली की घंटी
आसानी से
पहचानी जा सकती हैं वह
असहाय हैं
खीची जा सकती है
उनकी जबान
उनके नामों की बन सकती है
काली सूची
जीने-मरने के प्रश्न के बीच
कौन अभागा होगा
जो चुनेगा मौत।

पांच 

गिद्ध अपना स्वकर्म ही तो कर रहा था
फिर तुमने उन्हें मार दिया
अपने कुकर्मों से
उसका लगा लिया मुखौटा
वह गिद्ध कहीं नहीं गए
यहीं थे नदी के किनारे
तुम गिद्धों को क्यूं घुसेड़ रहे हो
अपने राजनीतिक फलसफों में
ढापने को अपना कुकर्म
तुम मनुष्य हो
तुम्हें आता भी क्या है
तुम्हें मौतें ऐसी लगती हैं
मानों खिलौने टूट गए हो
जिसे दोबारा ला दोगे
गिद्ध होते तो पहचान जाते
मौत का स्याह चेहरा
तुम रंगे हुए सियार भी नहीं थे
मैं कैसे कर सकता हूं
तुम्हारी तुलना गैर-मानव से
यह तो उनका अपमान हुआ
तुम क्या जानो
अपमान की परिभाषा
खुलेआम घूमते हो
मुंह में खून लगाए
अफवाहों की सांस लेते
प्रवचन देते हुए
उस दिन
मेरी उखड़ती सांसों के बीच
तुमने बंद कर लिए थे अपने कपाट
मेरी उखड़ती सांसें कह रही थीं
अबे सालों कुछ तो शरम कर लों
प्रवचन बाद में कर लेना।

छः 

बमबारी सिर्फ बमों की नहीं
श्रापों की भी हो सकती है
कांपते—तड़पते—हांफते—रोते—चिल्लाते—मुर्झाते मुंह से
श्रापों की बमबारी के बाद
शहर दस बार बनकर
ख़ाक हो जाना चाहिए था
मगर वह खड़ा है
होर्डिंग पर मुस्कुराते हुए
श्रापों की बमबारी
इतनी भीषण और दुर्षभ कि
वह ब्रह्मास्त्र की भांति भेद सकते थे
असीरगढ़ किले की अभेद्यता
इनकी ताक़त
कई परमाणुओं से ज्यादा थी
फिर भी निष्फल थे वह
उनके सत में नहीं था कोई दम
क्या वह किसी नाले में नहाकर लौटे थे?


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