जंगल नहीं
मेरा घर था वो
रौंद रहे थे
जब तुम मशीनों से मेरा घर
हम चीख रहे थे
अश्रु थे हमारी आंखों में
आवाज दी थी हमने तुम्हें
हमारे साथी मारे गए थे
आग की लपटों से जूझ रहे थे हम
हमारी कोलाहल भरे आवाज से धरती
रो रही थी
न जाने धरती पर जन्मे
नन्हें कीड़ों के कितने शिशु मारे गए
धीरे धीरे हम भूख प्यास से मरने लगे
तब भी हमने तुमसे ही भीख मांगी
विकास के नाम पर तुमने हमें
अपने ही घर से बेदखल कर दिया
कैसी स्वार्थता है तुम्हारी मनुष्य
तुमने अपने शिशु की तरह समझा होता
पर शायद ये भूल है हमारी
तुम तो अपने स्वार्थ के लिए
अपनों को ही कुचल देते हो
हाय यही है नियति
जग में दया नहीं है कही
शेष केवल स्वार्थ
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