(1)
दस के बदले बीस
बीस के बदले चालीस
काटो मारो पीटो छीनो
हम जीते हम जीते के शोर में
सब जानते होंगे मगर कोई नहीं कहेगा
दो देशों के राजा अपनी जनता से जीत गए
पूंजी श्रम से जीत गई
मूर्खता विवेक से जीत गई
(2)
राष्ट्रवाद की नदियां
युद्ध के समुंदर में ही गिरती हैं
और तूफान के बाद
विद्रूपताओं की स्थापना करती हैं
(3)
युद्ध तमाशबीनों के लिए
दूसरों को जलते देखने का
तब तक का सुख है
जब तक खुद को जला नहीं लेते
(4)
जयकारों में उलझा दो सारे सवाल
अंधे कुओं के हवाले कर दो विवेक
गालियों से ठिकाने लगा दो ज़िंदगी की गुहार
लेकिन फिर भी कहूंगा
युद्ध परिणाम नहीं है
विनाश की प्रक्रिया है
हार में छिपी है बदले की आग
जीत में छिपी है अगले युद्ध की प्रस्तावना
0 प्रतिक्रियाएँ
