कच्चा आँगन

उस कच्चे आँगन  की  याद है 
और मन भीगा भीगा

इस घर की सारी धरोहर 
 तुम्हारी है भाई !
मैं इस ऑंगन में
खेली भी तो नहीं हूँ

पिता के अधकच्चे मकान में होता था
मिट्टी का आँगन 
 उसे कब का  टाइल्स
 लगवा कर  पक्का 
 नया कर दिया गया है

वो जगह जहां ,बड़ी बहन
 झूठ मूठ की रसोई बनाते -बनाते
 एक दिन सच में
छान लाई गर्म पूरियाँ
और मसालेदार सब्ज़ी
कब का छुप चुका है,

जहाँ राख और मिट्टी के साथ 
घास के उसकन से माँजा जाता था 
बर्तन,
हर कोने से पहचान मिट गई है

वो पेड़ जिसकी डाल पर पीढ़े
का झूला डाल देर तक झूलते थे 
हम सब 
(ये सुना ,देखा था कि)
चक्कर आने पर 
खटाई खानी चाहिए,
हम झूठ मूठ का 
चक्कर- चक्कर कहते 
अचार के लिए हाथ फैला देते थे
बाद में अम्मा समझ गई ये चाल

इसी ऑंगन में भतीजा 
घन्टों चिड़िया पकड़ने के लिए
दौरी में डंडा फँसा
उसमें डोरी 
बाँध चद्दर में छुपा बैठा रहता

जामुन 
के टपकते फल,
नीम की गहरी हरी छाँव
छतों पर  पानी छिड़कना, 
 उसमें से तपन का धुंआ
 बन कर निकलना ,
 ज़मीन पर  गद्दे बिछाना, 
 खुले आसमान के नीचे  लेट कर  
 तारों  में आकृतियों को बनाना, 
 अंताक्षरी खेलना  
 रिश्तेदारों  का आना,
 उनके घर जाना, 
कम साधन में बड़ा दिल रखना 
 छतों पर चढ़ती हुई,
लौकी, नेनुआ, कद्दू  की बेलें, 
छत पर  बिखरी हरियाली, 
 पत्तों को हटा कर  
ताज़ी सब्ज़ियों को  
 खोजना और तोड़ना, 
एक ही चारपाई पर  
घन्टों  बिना स्पेस तलाशे,
 बैठे रहना,
ननिहाल जाना , आम ,खरबूजा खाना 
बस  याद आती है उस समय की  

विकास के लिए ज़रूरी है 
हर जगह सीमेंट 
 पर मन को 
 पत्थर मत करना भाई

 अब बात  में ही 
 कविता  करने  लगी 
 कह कर हँस दिया था भाई

कल भाई  से बात करकेलगा 
ऑंगन में लगी हुई टाईल्स
थोड़ा दरकने लगी हैं
और उनके नीचे से 
झाँकने लगी है 
कच्चे ऑंगन की
मिट्टी


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