कूड़ा बिन रहा था वो

मन में कुछ आस लिए
ज़िन्दगी की साँस लिए
दीनता की फाँस लिए
कूड़ा बिन रहा था वो

पैरों तले रौंदकर स्वाभिमान को
गला घोंटकर आकांक्षाओं का
निष्ठुर भूख से आहत होकर
कूड़ा बिन रहा था वो

बचपन की हरियाली सुलगाए हुए
केवल कटि में फटा कपड़ा लटकाए हुए
ठंड की तेज धार को
सीने में सहता हुआ
कूड़ा बिन रहा था वो

मौत से ना डरता था वो
जानता था
भूख की तलवार से बेमौत जब वो मरेगा
सड़ेगा इसी कूड़े की तरह
सोचकर ये
मानवता पर हँसता हुआ
कूड़ा बिन रहा था वो

राजसत्ता की योजनाएँ तो उसे नकारती हैं
अच्छे दिन की कल्पनाएँ तो उसे लताड़ती हैं
समाज से सहमा हुआ
ज़िन्दगी की ओस को सूरज से बचाने के लिए
कूड़ा बिन रहा था वो

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