मां की बीमारी के दौरान



मां बीमार है 
अब घर जाने का जी नहीं चाहता 
लगता है
मानो मां के साथ 
घर भी भर्ती है 
अस्पताल में…!

२.

घर बिखरा पड़ा है 
पिता बिखरे हुए हैं 
घर, अस्पताल, 
नौकरी, बच्चे, ससुराल 
मन के भीतर
देह के बाहर 
न जाने 
कहां–कहां बिखरी–बिखरी 
घूम रही हैं 
तुम्हारी बेटियां 
माँ जल्दी लौट आओ 
अस्पताल से घर 
यहां सब कुछ बिखर रहा है 
 तुम्हारे बिना…!

३.

तुम आईसीयू में लेटी हो 
मैं कांच से 
देख रही हूं तुम्हें 
तुम्हारी आँखें 
गीली हैं 
बदन कृशकाय 
हाथ काँप रहे हैं बेतहाशा 
नर्स मुझे हटा रही है यहां से
मैं तुमसे लिपटना चाहती हूं 
कांच के इस पार से उस पार की 
दूरी इतना डरा रही है 
जितना डर तुमसे दूर जाने पर 
पहले कभी नहीं लगा मां..!

४.

जबसे तुम भर्ती हुई हो अस्पताल में 
ना गाय रंभाती है 
ना सवेरे चिड़िया, कव्वे आते हैं 
दावत उड़ाने 
न कालू भौंकते–भौंकते हक से 
मांगने चला आता है गुड़ रोटी 
पिता की आवाज़ से गायब है खनक 
मुरझाए से खड़े रहते हैं नींबू, आम, अमरूद के पेड़ 
घर के छोटे बच्चे पहले से ज़्यादा शांत 
और समझदार बन गए हैं आजकल
बोझिल सी हवा चुपचाप बहती है 
एक कोने में बेपरवाह बैठे रहते हैं तुम्हारे लड्डू गोपाल
घर की मिट्टी में बढ़ गई है थोड़ी ओर नमी
गमलों में लगे फूल
बालकनी से उचक कर 
देख रहे हैं तुम्हारा रस्ता 
अबाबील और मुनिया के बच्चे उड़ने से पहले 
मिलना चाहते हैं तुमसे
तुम्हारी बेटियां ही नहीं 
ये सब भी कर रहे हैं 
तुम्हारे ठीक होने की मौन प्रार्थना
अब लौट भी आओ मां 
भला इतने दिनों तक 
कौन रहता है अपने घर से दूर!!


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