परमात्म प्रकाश

भाषा: यह ग्रंथ मूल रूप से अपभ्रंश भाषा में दोहों के रूप में लिखा गया है।
विषय वस्तु: यह ग्रंथ मुख्य रूप से शुद्ध आत्म-स्वरूप और मोक्ष मार्ग का वर्णन करता है। इसका उद्देश्य शिष्य प्रभाकर भट्ट द्वारा पूछे गए संसार के दुखों से पार पाने के प्रश्न का उत्तर देना था।
मुख्य उपदेश: ग्रंथ बहिरात्मा, अंतरात्मा और परमात्मा के स्वरूप का विस्तार से वर्णन करता है और बताता है कि जीव किस प्रकार ध्यान और स्वसंवेदन ज्ञान के माध्यम से कर्मों के मैल को नष्ट करके परमात्मा स्वरूप को प्राप्त कर सकता है। यह शुद्धात्म-तत्व को जानने, उस पर श्रद्धा रखने और उसमें लीन होने का उपदेश देता है।
अधिकार (भाग): इस ग्रंथ को मुख्य रूप से दो भागों या अधिकारों में बाँटा गया है:
पहला अधिकार: इसमें बहिरात्मा (बाह्य वस्तुओं में लीन आत्मा), अंतरात्मा (आत्मा-अनात्मा का भेद जानने वाली आत्मा), और परमात्मा (कर्म रहित शुद्ध आत्मा) के स्वरूप का कथन है।
दूसरा अधिकार: इसमें मोक्ष, मोक्ष का फल और मोक्ष मार्ग का विस्तृत वर्णन किया गया है।
श्लोक/दोहे: टीकाकार ब्रह्मदेव जी के मतानुसार, इस ग्रंथ में कुल 345 पद्य (दोहे और कुछ अन्य छंद) हैं।

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