मैं रेत-सा मन लिए
प्यासा भटकता हुआ
आख़िरकार घृणा के कुएँ के पास आ बैठा
कितना सुंदर
कितना निष्पाप था मेरा ये हृदय
तुमने इसे कितने बाणों से बेधा
और कितना बेधा
(अब तो हर पल मवाद बहते हैं)
सच कहता हूँ मेरे लोगो!
मैं इसलिए तो इस दुनिया में नहीं आया था
0 प्रतिक्रियाएँ
