पतझर (१)
पतझर के सूखे पत्तों पर
हलके पाँव धरो !
इनमें थोड़ा मन है मेरा
तन भी होगा किसी दिवस।
पतझर के सूने आँगन मे
चुपके खड़े रहो !
नीरव में इसकी बोली को
समझो, मौन धरो।
पतझर के गिरते पत्तों पर
उचटी साँस भरो !
इनमें थोड़ा दुख है मेरा
सुख भी होगा किसी दिवस।
पतझर (2)
पतझर में मुझे जंगल चाहिए
जंगल नहीं, तो एक बाग़ चाहिए
बाग़ नहीं, तो कुछ पेड़ चाहिए
कम-से-कम एक पेड़ तो चाहिए
बाहर सबकुछ छीना जा चुका है
अपने भीतर मैं जंगल लिये फिरता हूँ
एक बाग़, कुछ पेड़, एक पेड़ लिये फिरता हूँ
वहाँ पत्ते उड़ते हैं, चक्कर खा कर गिरते हैं।
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