१.
नहीं रही अरवीना
नहीं रहा अनवर
नहीं रहे दयाबक्श
वे इतिहास के निर्माता हो सकते थे
महज़ तारीख़ें भर नहीं बल्कि इतिहास को
दिशाबोध कराने वाले ध्रुव तारे!
लेकिन अफ़सोस कि सारे वाजिब कारणों के होते हुए भी
वे इतिहास में कहीं नहीं हैं
उनके पेट के विज्ञान ने उनका भूगोल बदल डाला
वे अंतरिक्ष के दिग्भ्रमित पिंड होकर रह गए
जो भटक गए अपने परिक्रमण पथ से
छिटक गए अपनी धुरी से
और रोटी के शक्तिशाली ध्रुवों के गुरुत्व में उलझ गए
अफ़सोस! ज़िंदा रहने की जद्दोजहद में
भूख के अथाह ब्रह्मांड में वे कहीं खो गए
२.
उन्होंने रोटी माँगी
हमने उन्हें भूख दी
उन्होंने पानी माँगा
हमने उन्हें प्यास दी
उन्होंने भूखे बच्चे के लिए दूध माँगा
हमने उन्हें सस्ती दर पे क़र्ज़ दिया
उन्होंने घर जाना चाहा
हमने उन्हें इंतज़ार दिया.
कहाँ पता था उन्हें कि
उम्मीद की जिस गाड़ी में वे
कंधे पर भूख का बस्ता टांगे चढ़ रहे हैं
उसी गाड़ी से भूख के उसी बस्ते में बांधकर
‘संभावित संक्रमित’ कहकर किसी लावारिस बम की तरह
भूखे पेट ही किसी अनजाने प्लैट्फ़ॉर्म पर उतार दिए जाएँगे?
कहाँ पता था?
गाड़ी की खिड़की से अपने गांव की बाट जोहती आँखें
अपने गंतव्य पर पहुँचने से पहले ही पथरा जाएँगी?
३.
वे बचाए जा सकते थे
थोड़े से पानी
कुछ रोटियाँ
साधारण दवा की एक गोली
और बहुत थोड़ी सी मानवीयता से
वे बचाए जा सकते थे
लेकिन नहीं बचाए जा सके
अरवीना की बेटी जो
अपनी माँ की साड़ी से खेल रही है
नहीं जानती फ़र्क़ साड़ी और कफ़न में
और जाने भी कैसे
फ़र्क़ रह भी कहाँ गया है?
नहीं समझ पा रही वो कि कुछ दिनों पहले तक
उसकी माँ की पर्वत रूपी छाती से निकलने वाली
जीवनदायिनी दुग्ध की नदियाँ सूख क्यों गईं?
दरअसल ! वह खेल नहीं रही
बल्कि ढूँढ रही है –
भूख का वह बांध
जिसने उसके हिस्से का पोषण रोक लिया है!
४.
नहीं छपी ये खबर किसी भी प्रमुख अख़बार में
तो क्या अरवीना , अनवर और दयाबक्श
यूँ ही भुला दिए जाएँगे
अंतरिक्ष के किसी आवारा पिंड की तरह?
नहीं!
मैं अपनी कविता में जीवित रखूँगा उन्हें
सैकड़ों वर्षों में कभी कभार दिखाई देने वाले पुच्छलतारे की तरह
ताकि सनद रहे
मेरे हिस्से की भूख लेकर वे गुज़र गए
उनके हिस्से की रोटी लेकर मैं ज़िंदा हूँ
पुच्छलतारे
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