काउंटर के ऊपर स्क्रीन थी
सीसीटीवी के फुटेज थे जिनमें
एक मैं भी था
मैं देख रहा था ख़ुद को
किसी दूसरी ओर देखता हुआ
अपने से क्षण–भर पीछे चलता
मैंने हाथ हिलाया किसी और को
म्यूट पर, अंधकार से घिरा
चाहकर भी नहीं मिला सकता था
ख़ुद से आँख
आईना देखकर घबराने वाला मैं
यहाँ कैसे आ पहुँचा
स्क्रीन और काउंटर में एक साथ कैद
एक हाथ में झोला दूसरे में क्रेडिट–कार्ड
कविता में भी मैं–मैं करता हुआ
जैसे सामने हड़बड़ाती स्त्री का बारकोड स्कैनर।
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