यावर

याद है यावर—
तुम मुझे चाय पर बुलाने आए थे
मैं कुछ लिख रहा था और बरस पड़ा था तुम पर
सोचा था तुम भी वापस लड़ोगे
मगर तुम रो दिए थे
 
‘कोई मुझे मरा हुआ साँप दे
तो नहीं लेने का फैसला मेरा है।
 
जो अपनी भड़ास अपनों पर निकालता है
सबसे कमज़ोर आदमी होता है।’
 
चार साल हॉस्टल में अगल–बगल रहे
हम साथ खाना खाते रात सड़कों पर साथ भटकते   
कॉलेज में भी मिलते तो सलाम–वालेकुम अदबते
धर्म हमें दूसरी तरह बाँटता था
मैं नहीं समझता था कर्बला अली हदीस
लेकिन जब कभी राम या कृष्ण पर कोई बात छिड़ती  
तुम्हें पहले से पता होती सारी कथाएँ
 
जब आखिरी बार मिले
तुम किसी टेक–पार्क के बाहर खड़े थे
और हमने सिर्फ हाथ मिलाया था   
फिर हम साथ गए घर खोजने
कोई नाम सुनकर पलट गया तो कोई शाकाहार बोलकर  
एक से शुरू से अंत तक मैंने बात की
और जब भाड़ा डिपॉजिट तय कर लेने के बाद
तुमने अपना परिचय दिया
तब उसकी सूरत याद करते
हम देर तक हँसते लौटे थे
 
तुम्हारे लिए कुछ भी नया नहीं था
कई शहरों में रह चुके थे तुम
शायद इसीलिए मौका मिलते ही
सोचने लगे परदेस जाने की
 
‘जब किसी क़ौम का बुरा वक़्त आता है
तो हर जगह आता है।’
‘यहीं रहो। लड़ो।’
‘बहस से सिर्फ विचार का सिर ऊँचा होता है।’
 
आज मैं बिलकुल अकेला हूँ यावर
तुम दुबई जाओ या जकार्ता
कौन मानेगा तुम्हें अपना!


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