एक रात थी
जब शहर की रौशनी कहीं पीछे छूट गई
और मैं भी
किसी अनकहे मोड़ पर खुद से दूर हो गई
जागते हुए भी जैसे बेखबर थी मैं
जिसे हम हादसा कहते हैं
वो उस पल मेरे लिए एक लंबा विराम था
जिसमें दर्द तो था
पर एहसास नहीं
सब शून्य था
आँखें बंद थीं
पर भीतर कोई हलचल नहीं थी
हर हादसा सिर्फ जख्म नहीं देता
कभी-कभी वो हमें नींद की आगोश में ले जाकर
एक नया सुकून दे जाता है।
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