विडम्बना  

चाहता तो मैं कह सकता था सच
पर कह न सका
चाहता तो मैं जी सकता था जिंदगी
पर जी न सका

मैं बचपन में सिखाई नैतिकता
और समाज में व्याप्त अनैतिकता
के पाटों के बीच पिसता रहा
जीवनभर

नैतिकता मन में बसी होने के कारण
न मैं अनैतिकता का हो सका
अनैतिकता का दबाव होने के कारण
मैं नैतिकता का भी न हो सका।

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